Wednesday, 4 July 2018

वो अंतिम बसंत

~~~वो अंतिम बसंत~~~

इस पतझड़ में उस पेड़ के जो पत्ते झड़े..
फिर ना आने को उस से वो जैसे अड़े..
उसकी जर जर साखों में ,
कान्तिहीन काया में,
अब वो कैसे रहें..
अपना हरित श्रृंगार अब उसे कैसे दें..

अब रहा ही क्या था  इसमे ,,
अब तो ये पेड़ नही बस काठ है..
सभी तो छोड़ चुके हैं इसको..
अब ना फल ना फूल ,
ना गिलहरियाँ , ना पक्षी,
ना ही उनके घोंसले हैं..

अब इसमे ना इसमे शक्ति,
ना ही पोषण करने की क्षमता..
दीमकों का आश्रय बन गया है ये..
तनों में इसकी अब खिलता कुकुरमुत्ता..

पर पेड़ था अनजान ,
उसे तो बस बसंत का इंतजार था..
जैसे बच्चे लालायित होते,
नए कपड़े पहनने के लिए..
नई कक्षा की नई किताबों को देखने,
उनमें अपना नाम लिखने के लिए..

पेड़ भी वैसे लालायित था,
नए पत्तो, खुबसूरत फ़ूलों,
मीठे फलों ,से अपना श्रृंगार करने को
और नए पक्षियों , गिलहरियाँ,
के घोसलों को आश्रय देने को..

लो आया बसन्त ,
हर पेड़ों में बहार आयी..
ऋतुराज ने मानों सौन्दर्य की बर्षा की..
हर पेड़ था झूम रहा नए नए हरे पत्तों से.
बसने को इन पेड़ों में,
नए पक्षियों की कई टोलियाँ आयी..

वन गुंजायमान था पक्षियों के
कोलाहल में ,,
जैसे किलकारियां हो
नवजात के घर आने में..

पर इस सूखे पेड़ में अभी भी
सन्नाटा पसरा था,,
वो एक नग्न काया जैसे
अब असहज महसूस कर रहा था
ईष्या, विस्मय, डर के मिश्रित भावो से
वो सब पेड़ों के बीच रह रहा था..

उसे याद आया बगल में
कभी खड़े हुए उस सेहतुत के पेड़ की..
जब ये छोटा था तो उसकी ऊंचाइयों को
आदर्श मानता था, उसके जैसा बनना चाहता था..
उसमे भी तो एक बार पत्ते नही आये थे?
और फिर वो कुछ वर्षों में मरुवृक्ष होकर
वो धड़ाम से एकायक गिर गया था..

क्या मेरे साथ भी ऐसा होगा?
क्या इसबार मुझपे भी इसलिए पत्ते नही आये..
क्या इसलिए पक्षी घोसले बनाने नही आये..
क्या मैं भी मरुवृक्ष होकर गिर जाऊंगा?
क्या सभी का ये ही हाल होता है?
में तो समझता था मैं ऐसा ही रहूँगा..

पेड़ अपने ही सवालों का उत्तर ढूंढ चुका था..
फिर भी सच को नकारते हुए..
उम्मीद से पतों का इंतजार कर रहा था..
बसंत गया , ग्रीष्म आया,
अब वो धूप में नग्न काया लिए झुलस रहा था..

अब उसे अपना डर सच्चा लगने लगा..
ये संसार उसे अब स्वार्थी लगने लगा..
पत्ते स्वार्थी,, फूल स्वार्थी,, फल ये पक्षी स्वार्थी..
ये संसार है बस माया यहां कोई ना अविनासी..
अब उसे भी संत जैसा वैराग्य उत्पन्न हो गया..
छोड़ दिया उसने भी अन्न जल ,,
और खुद को प्रकृति के साथ सूखाने लगा..

ऋतु सावन की बरस के आयी,,
प्यासे पेड़ों को तृप्त करने लगी..
पर इस पेड़ में कोई प्यास ना थी..
उसे सत्य का ज्ञान था,,वो पहले ही तृप्त था..

एक सवेरा उसने देखा
एक कोमल लता उसपे चढ़ रही है..
जैसे बेनामी भूमि पे कोई कब्जा करे..
उस लता ने उस पेड़ के,
आधे हिस्से को अपने अधीन किया..
अपनी हरियाली से उसने
उस पेड़ का हरित श्रृंगार किया..

ये सुखा पेड़ भी
कुछ कुछ हरा सा लगने लगा..
पर वो फिर भी हर्षित न हुआ..
वो अब ज्ञानी जो था ..
जानता था ये अप्राकृतिक स्वार्थी श्रृंगार है.
ये भी एक क्षणिक भ्रम है , माया है..

वैसे भी बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम .
बस उसे ये श्रृंगार उसे ऐसे लगा..
फिर भी उस ने उस लता को आश्रय दिया..
निश्वार्थ भाव भी तो वैराग्य से उत्पन्न हो गया..
फिर एक रोज जाड़े की रात में ..
अपने शरीर मे दीमकों के दिये जख्मों.
उस ठंडी हवा के थपेड़ों ..
और निढाल शरीर के बोझ से
उसने अपना सामर्थ्य खो दिया..
उस सेहतुत के पेड़ की तरह
ये भी इस भूमि में गर्जना से गिरा...

~~~©आशीष नौटियाल~~~

No comments:

Post a Comment