कोई तो हो जो समक्ष आये.
अमिट स्वप्न सी नेत्रों में आये.
टूटे न निंद्रा अब जब में सौऊँ.
स्वप्न बह न जाये अब इतना न रौऊँ.
कविता मेरी अब उसके छंदों में हो.
कृति मेरी अब उसके रंगों में हो.
काव्यों में मेरे वो अलंकार सजाये.
गद्यों में मेरे वो किरदार निभाए.
किनारों में हूँ, फिर भी प्यासा हूँ, में.
बूंद स्नेह की पिला दे,"चातक पक्षी" हूँ मैं.
जीवन में आकर वो शंख नाद कर दे.
"जहान्वी" बनकर मेरे वो संताप मिटा दे.
लगे न जीवन में अकेला हूँ, मैं.
लगे मुझे तेरे तन की परछाई हूँ, मैं.
सुखी धरा में मैंने स्वप्न बीज हैं बोए.
संग में अब हम तेरे हँसे और रोयें.
सपनो को मैंने अबतक अकले है ढोया.
कन्धा दे लगे कुछ है जीवन में पाया.
~~~आशीष नौटियाल~~~
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