Monday, 22 October 2018

यादें

यादों की बारिश में ,
टपकी है आँखों से बूंदे फिर से..
मेरे दिल की छत में
तेरे खालीपन का सुराक
अभी भरा नही है..
~~~आशीष नौटियाल~~~

Friday, 12 October 2018

माँ सा

रिवायतों से देखा
तेरा मजहब,लिबास
खुद से अलग पाया..
ईमानदार सीरत से देखा
तेरा चेहरा हर नक्श से
अपनी माँ सा पाया..
~~~आशीष नौटियाल~~~

Thursday, 11 October 2018

पलायन

कैसे देवभूमि है अपनी 
जो तेरे बंजर मकान में भी
फूल खिला रही..
और एक तू है .
परदेश चला गया है
खुद को खिलाने के लिए..

कन देवभूमि ची अपरि
जु तेरा बाँझा कुड़ा मा भी
फूल ची खिलाणी..
यो तू ची
बिरणा मुल्क जयूँ ची..
खुद खिलणों तें..
~~~आशीष नौटियाल~~

Thursday, 4 October 2018

ज़माना

उड़ती धूल ,फिर ज़मीन पे आ गिरी..
ऐ हवा तू भी ज़माने की तरंह निकली..
~~~आशीष नौटियाल~~~

Wednesday, 3 October 2018

हाथ की लकीरें

हाथ की लकीरें
मेरे चेहरे में उभर आई हैं..
अब किसी से पूछना क्या   .
मेरे नसीब में क्या है ?
~~~आशीष नौटियाल~~~

Monday, 1 October 2018

क्या दूँ

रिक्त हूँ कुछ दे नही सकता..


पर कुछ गुनगुनी धूप 


बचायी है मैंने जाड़ों की,


 तेरी नम आंखों को सुखाने के लिए..


कुछ लड़कपन की शैतानियाँ ,


कुछ खेल,  कुछ खिलौने संजोए है मैंने,


तेरे होंठों पे हँसी खिलाने के लिए..


रास्तों से कुछ पगडंडियाँ ,


  कुछ कदम छिपा रखे हैं..मैंने,


तेरे संग संग राहों में चलने के लिऐ.


महफिलों से नज्म, शायरों से शायरी


कुछ कतरने कागज की ,और कुछ श्याही


इकट्ठा की है मैंने,


 तेरे रूप को गढ़ने के लिए..


मीरा का समर्पण, गोपियों का विरह.


सबरी के राम, राधा का कृष्ण


हर भाव से खुद को भरा है मैने


तुझ से प्रेम करने के लिए..


~~~आशीष नौटियाल~~~