उफ्फ कड़ाके की ठंड , ऊपर से बारिश , त्रिभुवन प्रसाद जी के लिए मानो ये मौसम उनकी यात्रा सुखद करने नही देगा ,आज उनकी समधन (बेटी की सास) ने कहा भी था कि मौसम खराब है आज रुक जाईए पर त्रिभुवन जी ठहरे ठेट पुराने खयालों के आदमी भला बेटी के घर कैसे रुक सकते थे..? उनके लिए तो बेटी के घर का पानी तक हराम था पर इस बार वो थोड़ा नए जमाने को अपनाते हुए पानी के साथ चाय नास्ता कर आये थे ,मगर बेटी के घर ना रुकना उनके लिए अभी भी सामाजिक सभ्यता थी, सो मौसम को अपनी नीयति मानते हुए ,बेटी की अश्रुपूरित विदाई को लेते हुए वो घर की और बारिश में निकल पड़े.. घर पहाड़ी के दूसरी छोर में था कई किलोमीटर पैदल चलना था रोड थी पर गाड़ियों का आवागमन समयनिर्धारित ही था ,, और आज बारिश हो गयी इसलिए गाड़ी के लिए यात्री नही होंगे और गाड़ी का मिलना नामुमकिन सा था ..पूस का महीना खत्म तो हो गया पर अभी ठंड मानो मानने को तैयार नही..त्रिभुवन जी थे तो लंबे पर उम्र ने थोड़ा कमर झुका कर उनके कद को छोटा कर दिया था बाल पूरे थे पर पके हुए , दाड़ी सफाचट,,. सर पे गाँधी टोपी, माथे पर तिलक , एक कंधे पर कपड़े का थेला ,और एक हाथ मे छाता , धोती ,कुर्ता ,ऊन की जवाहर कट जैकेट पहनें , छोटे छोटे कदमो से उनकी चाल नियमित थी.. ह बारिश और ठंड ऊपर से हल्का कोहरा तीनो ने मिलकर त्रिभवन जी की काया को उनकी उम्र का ऐहसास दिलाना शुरू कर दिया..त्रिभुवन जी काँपते हुए भीगते हुए गंतव्य की और दांत कटकटाते हुए बड़े जा रहे थे , शक्ति क्षीण हो रही थी, रास्ता अभी आधा भी नही नपा था दूर दूर तक कोई आश्रय ना था ऊपर से ठंड ने भूख को भी बड़ा दिया था..बारिश में रुक कर आराम भी नही कर सकते थे , क्या घोर संकट उत्पन्न हो गया था ,मन ही मन सोच रहे थे कहीं चाय की दुकान ही मिल जाये तो गरमागरम चाय से कुछ ठंड में राहत तो मिलेगी ,कम से कम दुकान में थोड़ा आराम तो मिलेगा , पर कहाँ? दूर - दूर तक बस कोहरा ही कोहरा ,आदमियों का कोई निशान नही ,,पर कुछ दूर जाने पर मानो भगवान को उनपर दया आगयी उन्हें एक आदमी अपने बैलों के साथ आते हुए दिखाई दिया , वे बेसब्री से उसके पास आने का इंतजार करने लगे वो पास आया तो त्रिभुवन जी ने कंपकपाती आवाज में कहा अरे भाई आस पास कोई बाजार है क्या ? कोई होटल ? कोई चाय की दुकान? आदमी ने त्रिभुवन जी की भेषभूषा और हालात देख के उत्तर दिया पंडित जी बाजार तो नही पर अगर आप इस नीचे वाली पगडंडी से चलेंगे तो आपको ऊपर गांव जाने वाले रास्ते मे एक चाय की दुकान मिलेगी , आगे ये पगडण्डी इसी रास्ते पर मिल जाएगी ,ये बोल कर वो आदमी थोड़ा ठहरा और बोला, पर वो दुकानआपके कामकी नही क्योंकि वो एक हरिजन (दलित) की दुकान है और आप ठहरे ब्राह्मण , आपके लिए तो बेहतर है आप इसी रास्ते पर चलते जाए..ये कहकर वो बैलो के पीछे पीछे चल दिया..त्रिभुवन जी के लिए विकट परिस्थिति आन पड़ी थी उन्होंने तय किया कोई नही, दुकान किसी की भी हो वहाँ कुछ नही खाऊँगा पर कम से कम बारिश के थमने तक रुक जाऊँगा थोड़ा आराम भी मिलेगा , ये सोचकर त्रिभुवन जी पगडण्डी पर चल पड़े दूर चलने पर उन्हें एक दुकान दिखाई दी जिससे धुँवा उठ रहा था उन्हें समझने में देर नही लगी कि ये ही वो चाय की दुकान है दुकान ज्योँ ज्योँ नज़दीक आ रही थी पकौड़े तलने की खुशबू तों तों तेज़ हो रही थी..त्रिभुवन जी की भूख ये खुशबू पहचानने लगी और और तेज़ वनाग्नि की तरंह त्रिभुवन जी के तन मन मे फैलने लगी ..मंत्रमुग्ध से त्रिभुवन जी दुकान में पहँचे , देखा चूल्हे पर एक अधेड़ उम्र का आदमी पकौड़े बना रहा था , त्रिभुवन जी की आहट सुनकर वो उनके और देखते हुए मौन शब्दों से गर्दन झुका कर अभिनंदन करता हैं त्रिभुवन जी भी मौन रूप में गर्दन झुका कर अभिवादन स्वीकार करते हैं ।।त्रिभुवन जी की भेषभूषा से वो जान गया कि एक ब्राह्मण पंडित उनकी दूकान में आया है थोड़ा हिचकिचाहट भरे लहज़े में उसने कहा पंडित जी बैठिये आप भीग गए होंगे, त्रिभुवन जी भी मुश्कान देते हुए छाता बंद करते हुए दुकान के अंदर घुस गए ,आज बारिश ने तो हद कर दी त्रिभुवन जी ने ये कह कर बातचीत की शुरुआत कर दी , आदमी ने कहा हाँ पंडित जी सुबह से बारिश थम नही रही ठंड में कोई बाहर निकल नही रहा ना आज कोई ग्राहक आया, मैं भी दुकान बंद कर के घर ही जाने वाला था पर सोचा अपने बच्चों के लिए थोड़े पकौड़े बना के ले चलता हूँ वो भी खुश हो जाएंगे...त्रिभुवन मुश्कान देते हुए उसकी हर बात का समर्थन कर रहे थे ..पर उनकी भूख मानो सभी सामाजिक ,धार्मिक व्यवस्थाओं से विद्रोह कर के पकोड़े खाने को उन्हें प्रेरित कर रही थी.. ऊपर से ठंड ,त्रिभुवन जी के मन मे द्वन्द शुरु हो गया , एक तरफ सामाजिक लोकाचार था एक तरफ ये तन की भूख..उनका मन एकाग्रता खो रहा था , और जब हमारा मन कोई कार्य करना चाहता है तो हम शास्त्रों ,धर्मग्रन्थ इत्यादि में अपने मन अनुसार बातों को खोज लेते हैं उनके मन ने भी सबरी और राम के प्रशंक को खोज लिया ..और कहा जब प्रभु राम बिना भेदभाव के सबरी के झूठे फल खा सकते हैं तो फिर में क्यों नही हरिजन के हाथ का बना नही खा सकता ,वैसे भी कर्म अनुसार ही जातिओं का विभाजन हुआ है और ये कर्म से खाना बना के सब को खिला रहा है उस हिसाब से तो ये शूद्रों वाला कर्म नही कर रहा फिर क्यों इस से भेदभाव करुँ..उनके मन ने उन्हें शंकराचार्य के अद्वेतवाद से लेकर मध्वाचार्य जी के द्वेतवाद का स्मरण करा दिया और वो अद्वेतवाद को मानते हुए सोचने लगे कि ब्रह्म तो सबमे विद्यमान है हम दोनों में तो कोई भेद ही नही, जो भेद है वो सब भ्रम है..मन जीतने लगा , त्रिभुवन जी ने लोकाचार को हराते हुए निर्णय किया कि वो पकौड़े और चाय पी ही लेंगे ,, वहीं उस आदमी के मन मे भी द्वन्द चल रहा था कि एक पंडित को कैसे आग्रह करूं ? भले ही मेरी दुकान में कई ब्राह्मणों ने चाय पी है पर वो सब पेंट जीन्स वाले ब्राह्मण थे ये तो धोती पहने पंडित जी है ..पर उसका मन भी उसे चाय बेचने पर मजबूर कर रहा था, उसका मन कहने लगा , बाजार में आ जाने पर कोई जाति धर्म नही होता बस एक ग्राहक होता है एक विक्रेता वैसे भी गीता में लिखा है कर्म किये जा फल की इच्छा ना कर, और मेरा कर्म है विक्रेता बन के धनर्जन करना और यदि मैं ऐसे ही लोकाचार देखता रहा तो बच्चों को पालूंगा कैसे?..वैसे भी आजके पूरे दिन एक ही आदमी आया है क्यों ना इसे ग्राहक बनाया जाए।।उसके मन ने भी लोकाचार को दरकिनार कर दिया उसने भी निर्णय कर लिया कि पंडित जी को पूछ ही लेगा चाय और पकौड़े के लिए...यहां दोनो निर्णय कर के ज्योँ ही आगे बढ़ने को थे तभी आवाज आई पंडित जी नमस्कार! आप यहां? सामने त्रिभुवन जी ने देखा कि उनके पास के ही गांव के पंडित उमाशंकर खड़े थे , त्रिभुवन जी ने कहा अरे उमाशंकर तुम यहां ,में तो लड़की को उसके मायके छोड़कर आ रहा था बारिश रुकने का इंतजार कर रहा था त्रिभुवन जी ने हड़बड़ा कर कहा...उमाशंकर ने भी जवाबमे कहा कि वो पास के ही गांव में पूजा करने आया हुआ था वो भी आज घर जा रहा था बारिश बहुत हो रही थी सो रुकने का आसरा ढूंढ़ रहा था..उमाशंकर भी अंदर आकर दुकान में त्रिभुवन जी के पास बैठ गए . यहां त्रिभुवन जी का मन उमाशंकर को गाली देने लगा , जो पानी मूँह में पकौड़े खाने के लिए आया था , वो पानी भूख की आग शान्त करते हुए लुप्त हो गया ..लोकाचार हारी हुई बाजी फिर जीत गया था , कुछ देर बाद बारिश थमी त्रिभुवन और उमाशंकर दोनों उठ कर अपने गंतव्य के लिए साथ चल दिये..दुकान में बस ठगे से दो ही रह गए एक वो आदमी और एक त्रिभुवन जी का मन...और सामाजिक लोकाचार जीत की खुशी में फिर हँस रहा था
..आशीष नौटियाल