ना तेरी फ़िक्र होगी , ना ज़िंदगी में तेरा अब जिक्र होगा।।
रह रह के बैचैन किया जिसने मुझे..
तेरी यादों का न अब वो तिलस्म होगा..
बेरुखी ने तेरी कर दिया इस दिल को बंजर..
रुला के सूखा डाले मेरे आँखों के समंदर..
अब ना मुझे तेरे इश्क़ का इन्तजार होगा..
ना तेरी फ़िक्र होगी , ना ज़िंदगी में तेरा अब जिक्र होगा।।
लगता मेरे इश्क ने तुझे घुटन दी है.
तुझे भाता सारा आकाश मैंने तेरी उड़ान बाँधी है..
उड़ लो बेहिसाब अब ना लौट आने को तेरा इन्तजार होगा..
ना तेरी फ़िक्र होगी , ना ज़िंदगी में तेरा अब जिक्र होगा।।
शायद रेत में अपने इश्क़ का कलमा लिख रहे थे हम..
पत्थरों पे भी होगा दिल इसका था शायद हमे भ्रम..
होंगे कई तेरी चौखट पे खड़े पर अब मेरा दिल न होगा..
ना तेरी फ़िक्र होगी , ना ज़िंदगी में तेरा अब जिक्र होगा।।
~~~©आशीष नौटियाल~~~
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