ओ यारा तू मतलबी..ओ यारा तू मतलबी.
फूल सा था मैं जब रंगीन ..
मेरे रंगों से खेली तूने होली..
रस रस मेरा लुटा तूने .
खाली कर दी मेरी झोली..ओ यारा तू मतलबी
सागर सी तू अब इतराती .
मुझ पोखर को अब तू भुली..
रस गगरी मेरी कर के खाली..
फोड़ दिया दे ठोकर मारी.. ओ यारा तू मतलबी
आंखों को मेरे सपने दिखा के
भर गयी इनमे खारा पानी..
दर दर खुद को खोजने निकलूँ.
मेरा पता में ही ना जानू...ओ यारा तू मतलबी
तन में मेरे जगा के सावन..
दे गई फिर पतझड़ सी अगन.
अब किसी ओर है तू बरसती.
जल जल के मैं यहां राख हो रहा..ओ यारा तू मतलबी
दिन के उजाले तूने छीने..
अंधरे दर्द के मुझे लगे है पीने..
में पतंगा अब मारूंगा जल जल
घाव ये इश्क का न देगा जीने.. ओ यारा तू मतलबी
~~~आशीष नौटियाल~~~
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