Sunday, 26 August 2018

प्रेम हो तो कुछ ऐसा हो. जिसमे मीरा सा समर्पण हो. दुनिया से जो कर दे वैरागी . मीरा के जैसा विरक्त हो.. में भी चाहूँ ऐसा प्रेम मिले .. जिसमे में भी विरक्त रहूँ .. मुझे भी मिले विष का प्याला .. मेरे प्रेम को भी अमरत्व हो. ~~~आशीष नौटियाल~~~

प्रेम हो तो कुछ ऐसा हो.
जिसमे मीरा सा समर्पण हो.

दुनिया से जो कर दे वैरागी .
मीरा के जैसा विरक्त हो..

में भी चाहूँ  ऐसा प्रेम मिले  ..
जिसमे में भी  विरक्त रहूँ ..

मुझे भी मिले विष का प्याला ..
मेरे प्रेम को भी अमरत्व हो.

~~~आशीष नौटियाल~~~

Saturday, 25 August 2018

दुनियां की भीड़ में तेरा नामुमकिन है मिलना.. आ जाना मगर ख़्वाबों में, मेरे जगने से पहले निकला हूँ अभी अभी ज़िन्दगी के सफर में आ जाना मगर राहों में ,मेरे भटकने से पहले आशीष ने समेटा है खुद को कई सदियों में.. आ जाना मगर इस जन्म,मेरे बिखरने से पहले. ~~~आशीष नौटियाल~~

दुनियां की भीड़ में तेरा नामुमकिन है मिलना..
आ जाना मगर ख़्वाबों में, मेरे जगने से पहले

निकला हूँ अभी अभी ज़िन्दगी के सफर में
आ जाना मगर राहों में ,मेरे भटकने से पहले

आशीष ने समेटा है खुद को कई सदियों में..
आ जाना मगर इस जन्म,मेरे बिखरने से पहले.

~~~आशीष नौटियाल~~

Thursday, 23 August 2018

फूल का प्यार

कहीं किसी डाली में एक गुलाब खिला....
खुसबू से उसकी सारा बाग बान महका...

अभी अभी जवाँ हुआ था वो....
इस दुनिया के चेहरों से अनजान था वो...

सपना था उसका की तोड़े जो हाथ उसको..
हो वो किसी स्वर्ग से उतरी अप्सरा का..
किसी कोमल ह्रदय का ..किसी मदभरी आँखों का..

हो वो परी जो मुझे अपने में खिलाना चाहे...
मेरी खुसबू से महकना चाहे...
मुझे ह्रदय से लगाना चाहे...

सजाये कभी वो मुझे अपने बालों में..
महकाये कभी वो मुझे अपनी किताबों में..

आया वो दिन उसे तोड़ने एक अप्सरा क हाथ आये...
सपना सच होते देख उसके होंठ मुस्कुराये...

डाली छोड़ चला गया वो अपने सपने जीने..
कभी उसे के हाथों में खिलने ...
कभी उसे के बालों में सजने...

मिलन की ख़ुशी में ऐसा महका वो...
उस के तन को उपवन बना गया वो...

लुटा दिया सब कुछ उसने अपने प्यार में...
दे दी उस ने सारी खुसबू उसको..
दे दी  अपनी सारी जवानी उसको...

लुटा के सब कुछ उस पे कुछ बचा नहीं..
ना थी उसमे वो महकती खुसबू...
ना थी उसमे वो आँखों को चुराती सुन्दरता..

अब उस अप्सरा को ये नहीं भाता था...
अब ना ये उसे महका पाता था..
ना अपनी सुन्दरता से उसे लुभा पाता था..

बालों में सजे इस गुलाब को अब फेंक दिया गया..
फिर बागों से जवाँ एक गुलाब लाया गया...
उसकी जगह उसे बालों में सजाया गया...

गुलाब था खामोश मगर वो समझ  चूका था..
इस दुनिया के चेहरों को वो पहचान चूका था..

ये दुनिया बस किसी की खुशबू से महकना चाहती है..
ये मतलबी है बस लेना जानती है..

प्यार में जिसने अपना सब कुछ लुटा दिया..
सुना है वो अगले दिन सड़कों में कुचला मिला..

फिर भी होंठों में हंसी थी उसके ..
की उसने सच्चा प्यार किया..
थोड़ा ही सही वो अपने प्यार को महका गया..

--------आशीष नौटियाल---------

Thursday, 16 August 2018

अटल जी की अनंत यात्रा

सिंधु रो रहा .
धरा का हर बिंदु रो रहा..
धूमिल है सूर्य आज.
चन्द्र ओज ढूंढ रहा..
भारती विलाप से है छाती पिटती.
उसका "अटल" आज अंनत जा रहा
~~~आशीष नौटियाल~~~

Sunday, 12 August 2018

माँ एक गोली मुझे लग गयी..

माँ जो बादल सीमा पार से आये.
संग में गोलियों की बरसात जो लाये.
एक बूंद मुझे भी भिगो गयी.
माँ मुझे एक गोली लग गयी.

देश की लौ बुझाने ये वर्षा थी आई.
माँ फिर भी लौ बुझ ना पाई.
एक- एक बूंद खून की मेरी लौ जलाती रही.
माँ मुझे एक गोली लग गयी.

भीगने का डर अब मुझे नहीं था.
उदित हो सूरज ये अब मन में था.
मेरी गोलियां बादलों को छेदती रही.
माँ मुझे एक गोली लग गयी.

प्रवाह तेरे दूध का मेरी धमनियों में था.
कुछ कर गुजरने का जज्बा मेरी आँखों में था.
ऐसा लाया तूफान जो बादलों को उड़ा ले गयी.
माँ मुझे एक गोली लग गयी.

अँधेरे को दूर भगा दिया मैंने.
सूरज की तपन महसूस की मैंने.
माँ अब साँसे मेरी उखड़ने लग गयी.
माँ मुझे एक गोली लग गयी.

माँ अब नींद सताने लगी थी.
ऑंखें तेरी गोद तलाशने लगी थी.
प्राण गए पर तुझे देखने ऑंखें खुली रही.
माँ मुझे एक गोली लग गयी.

"जो थे माँ तेरे कंधे वो चार कन्धों में आयेंगे.
मुझ मालुम है तेरे आँशु अब न थमने पाएंगे."

"दुनिया में आते देखा तुने मुझे,
अब दुनिया से जाते देखना होगा.
मुझे जो गोली लगी माँ.
उससे सवाल पूछना होगा."

"कितना रक्त पीयेगी तू.
कितनी गोद करेगी सुनी.
दोनों पार बेटे मरते हैं.
माँओं की गोद होती सुनी."

~~~आशीष नौटियाल~~~

Tuesday, 7 August 2018

बुझा दो सूरज ..चाँद को बादलो से ढक दो..
श्याह कर दो ये गली. मोहल्ला.
फिर देखो जो घर जलता हो मसाल सा.
ये उसका ही है जो शहीद हुआ है देश के लिए..
~~~आशीष नौटियाल~~~

Sunday, 5 August 2018

काश ये शहर माँ तेरे जैसे होता

काश ये शहर माँ तेरे जैसे होता..

ख़ौफ़ से भरी इसकी फिजाओं मैं..
ख़ौफ़ज़दा सा मैं डर डर के जी रहा
भंवर सी इसकी ये अनगिनत सड़के
जहाँ मैं अपनी जवानी खो रहा..
दिल में भरे हैं इसके स्वार्थ बेरुखी के दलदल.
रात और दिन यहाँ बस रुपयों की हलचल..
काश ये शहर माँ तेरे जैसे होता..
नाम नहीं मुझे गोलू बुलाता..
उठता मुझे गोद में..मुझे पुचकारता..
मेरे डर को दूर कर के ..
स्नैह की एक ओट देता.
भटकता मैं तो डांटता..मारता ..समझाता..
पर मुझे राहों से भटकने न देता
काश ये शहर माँ तेरे जैसे होता..

~~~ashish nautiyal~~~

Thursday, 2 August 2018

मेरे बंजर दिल मे आकर बरस तो गए हो.. दलदली ज़मीं से खुद को अब निकालोगे कैसे.. ~~~आशीष नौटियाल~~~

मेरे बंजर दिल मे आकर बरस तो गए हो..
दलदली ज़मीं से खुद को अब  निकालोगे कैसे..
~~~आशीष नौटियाल~~~

शहर की आबोहवा में सड़ रहे हैं रिश्ते कई हमारे इश्क को भी जरा ढक के रखो ~~~आशीष नौटियाल~~~

शहर की आबोहवा में सड़ रहे हैं रिश्ते कई
हमारे इश्क को भी जरा ढक के रखो
~~~आशीष नौटियाल~~~