Tuesday, 3 July 2018

विरह

विस्मृत कर के उसकी स्मृतियाँ...
नैनों से मिटा के उसकी आकृतियाँ..
मुझे उसे से तू  अब विरक्त कर...
इस विरह का अब तू अंत कर..

प्रेम नहीं ये थी मरीचिका ..
विरह में मुझे तड़पाने की उसकी कृतिका..
बुझा प्यास मेरी या मुझे अब संत कर..
इस विरह का अब तू अंत कर..

हे समय चक्र तू थोड़ा तेज़ चल..
सुखा दे मेरे नीर प्रपातों का जल..
इन खाली पहरों को तू अब अल्प कर..
इस विरह का अब तू अंत कर..

पथिक हूँ पर रुक सा गया हूँ...
दोड़ रहा है जग मैं  थम सा गया हूँ ..
दे मुझे मंजिल और मेरा विस्तार कर..
इस विरह का अब तू अंत कर..

~~आशीष नौटियाल~~

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