प्रेम प्रदशर्न मुझको ना आये..
संकोच से मेरे भाव संकुचाये..
नहीं हूँ मयूर जो पंख फैलाऊँ..
नाच नाच मैं तुझे रिझाऊं..
जल में घुला दुग्ध रुपी प्रेम मेरा..
तू बन जा हंस चुन ले प्रेम मेरा..
तेरे प्रेम बिन मैं तो मात्र जल हूँ
मेरी आत्म हो अब तुम मैं तो बस देह हूँ
मैं हूँ सागर मेरे भाव है मोती..
तू बन के चंद्र मुझमें ज्वार क्यों ना लाती..
जो बहार आते मोती तब तुम समझती...
अथाह प्रेम का हूँ कुबेर तुम मान लेती..
मौन हूँ नहीं कह सकता तुमसे प्रेम है कितना..
अतिसयोक्ति होगी यदि कहूँ अनगिनत तारों जितना..
शायद होगा उतना जितना चातक की लालसा में.
दृश्य मात्र को व्याकुल जैसे गोपीयों के विरह में..
~~~©ashish nautiyal~~~
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