Wednesday, 4 July 2018

चक्र

ये नदियाँ जो मुझ में आ मिली.
एक तृप्त सिन्धु बन गया मै.
बहे हर्ष से रिमझिम नीर.
नमकीन खारा हो गया मैं..

प्रेम लहर मैंने छलकाए.
एक पागल अनुरागी बन गया मैं.
निकले वो भावों के मोती.
निशब्द कवि बन गया मैं.

उसके रंगों से रंगा मैं ऐसे.
ज्वार उल्लाश का बन गया मैं
उछाला मचला उस चाँद की कलाओं में ऐसे.
एक मदमस्त नृत्यांगना बन गया मैं.

पर पथिक थी वो उड़ गयी बादल बनकर.
मोन दर्शन अभिलाषी बन गया मैं..
वियोग मैं बहे फिर नीर ऐसे.
पुनः: खारा हो गया मैं.

ये चक्र था, ठहराव नहीं.
बस ये समझ न पाया मैं.
फिर वो बरसेगी बूंदों में वो.
पुनः: व्याकुल चातक बन गया मैं.

ढले की नदियों में वो फिर से.
पुनः हर्षित होऊंगा मैं.
फिर पुनः: हर्ष: के नीर बहेंगे .
खारा था पुनः: खारा हो जाऊँगा मैं...
..ashish

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