बेपरवाह वो एक पतंग
उड़ान चाहे अब मस्त मलंग
डोरी से वो लड़ पड़ी
उससे वो कह पड़ी..
तेरी धुन में क्यों में नाचूँ?
घूमूंगी स्वयं स्वछंद गगन.
सुन रे कटपुतली नही हूँ,
ना ही तेरे हाथों का कंगन..
जैसे तू नाच नचाये
अब न वैसे डोलूँगी.
परतंत्र हरगिज स्वीकार नही.
स्वतंत्र राष्ट्र में अब तो बोलूंगी.
डोर ने ढीली कर दी बाहें
बोली जा उड़ ले आसमान में..
पर इस आसमान का अंत नही
तुझे कैसे समझाऊँ में.
तू ने समझा तू स्वयं उड़ती है
मेरी बाहों का कोई मोल नही
तेरे सफ़र में मैं भी था
सारी उड़ाने सिर्फ तेरी नही
डोर ने छोड़ा, पतंग उड़ी.
गोता खा के सँभली. संभल के
फिर लड़खड़ा के गिरी..
आसमान छूने का ख्वाब छूटा.
न जाने कितनों ने उसे लुटा ,,
छलनी छलनी फटी फटी वो
दूसरे पल जमीं पर पड़ी वो
~~~आशीष नौटियाल~~~