Thursday, 10 January 2019

डोर और पतंग

बेपरवाह वो एक पतंग
उड़ान चाहे अब मस्त मलंग
डोरी से वो लड़ पड़ी
उससे वो कह पड़ी..

तेरी धुन में क्यों में नाचूँ?
घूमूंगी स्वयं स्वछंद गगन.
सुन रे कटपुतली नही हूँ,
ना ही तेरे हाथों का कंगन..

जैसे तू नाच नचाये
अब न वैसे डोलूँगी.
परतंत्र हरगिज स्वीकार नही.
स्वतंत्र राष्ट्र में अब तो बोलूंगी.

डोर ने ढीली कर दी बाहें
बोली जा उड़ ले आसमान में..
पर इस आसमान का अंत नही
तुझे कैसे समझाऊँ में.

तू ने समझा तू स्वयं उड़ती है
मेरी बाहों का कोई मोल नही
तेरे सफ़र में मैं भी था
सारी उड़ाने सिर्फ तेरी नही

डोर ने छोड़ा, पतंग उड़ी.
गोता खा के सँभली. संभल के
फिर लड़खड़ा के गिरी..

आसमान छूने का ख्वाब छूटा.
न जाने कितनों ने उसे लुटा ,,
छलनी छलनी  फटी फटी वो
दूसरे पल जमीं पर पड़ी वो

~~~आशीष नौटियाल~~~

Wednesday, 9 January 2019

बिजली की तार में, उलझी हुई पतंगो ने .. तेरे शहर का मिजाज बयां कर दिया.. ये पंख तो देता है मगर, उड़ने को आसमां नही ~~आशीष नौटियाल~~

बिजली की तार में,
उलझी हुई पतंगो ने ..
तेरे शहर का मिजाज बयां कर दिया..
ये पंख तो देता है मगर,
उड़ने को आसमां नही
~~आशीष नौटियाल~~

Saturday, 5 January 2019

शोर बहुत है गली में, तभी तुम्हे पता ना चला, मेरे इस खामोश मकान में , चीखें बहुत बोलती हैं... ~~~आशीष नौटीयाल~~

शोर बहुत है गली में,
तभी  तुम्हे पता ना चला,
मेरे इस खामोश मकान में ,
चीखें बहुत बोलती  हैं...
~~~आशीष नौटीयाल~~