Wednesday, 4 July 2018

शाश्वत प्रेम

ना वेदों के आख्यानों में.
ना मंत्रों के ब्याख्यानो मैं.
नहीं प्रेम  को पारिभाषित मैंने किया.
मैंने शाश्वत प्रेम किया.

बोली भावों की अनसुलझी भाषा.
रही ह्रदय में बस उसकी  अभिलाषा.
उसको कहानी से काव्य किया.
मैंने शाश्वत प्रेम किया.

"मीरा" के उस कृष्ण को पाया.
"रूमी" के उस अल्हा को पाया.
परम ब्रहम को निकट किया.
मैंने शाश्वत प्रेम किया.

बना "रात्रिचर" ना जाने कैसे.
रूठी निंद्रा न जाने कैसे.
नैनो में उसको "स्वप्न" किया.
मैंने शाश्वत प्रेम किया.

मौन भावः उसने जगाये.
आँखों के आंशु छलकाए.
अंतःकरण मैंने शुद्ध किया.
मैंने शाश्वत प्रेम किया.

मदिरा के उस घूंट को पिया.
अमृत कि उस बूंद को पिया.
उसको जीवन का हर स्वाद किया.
मैंने शाश्वत प्रेम किया.

वो नहीं तो फिर भी वो प्रेम रहेगा.
माली न रहे फिर भी ये पुष्प खिलेगा.
उस प्रेम मैं मैंने "समर्पण" किया.
मैंने शाश्वत प्रेम किया.

उसका ही अब "वरण" करूंगा.
उसमे ही अब "विरल" बहूँगा.

उस प्रेम के साथ मैं करुँ अब विचरण.
मिले जीवन मैं उससे ही त्वरण.
By Ashish Nautiyal

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