Wednesday, 4 July 2018

ना निशब्द रहो

अब न तुम निशब्द रहो.
मुस्काते व्यंगों को अब न सहो.

नदी हो तुम "अविरल" बहो.
बांधों के बंध अब न सहो.

मेघों की तरंह तुम गरजते हो आये.
सिंह पे कैसे ये चूहे चिल्लाये.

अब गरजो ऐसे की सिंह भी थर्राए.
बरसो ऐसे की वशुंधरा तृप्त हो जाए.

चुन ले कोई वो "मोती" न बनो.
छु भी न पाए कोई धधगता वो "सूर्य" बनो.

बांध लो जटाओं में तुम निराशा के प्रवाह को.
गले में धारण कर लो अभाग्य के गरल को.

कुंद तलवारों से तू युद्घ जीता दे.
बिन वज्र तू नभ को चम्म्कादे.

बहुत हुई वो शमशानी रातें.
स्वप्न की वो कुंठित यादें.

उठो अब समग्र बनो.
बिन पंखों के अनंत उड़ो.

हवाओं का तुम वेग न देखो.
अनंत उड़ोगे अपने विश्वाश को देखो.

मिलेगी मंजिल ये विश्वाश है मेरा.
कर्म कर ऐसा की टूटे न विश्वाश मेरा..

~~~आशीष नौटियाल~~~

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