Friday, 27 December 2019

लोकाचार

उफ्फ कड़ाके की ठंड , ऊपर से  बारिश , त्रिभुवन प्रसाद जी के लिए मानो ये मौसम  उनकी यात्रा सुखद करने नही देगा ,आज उनकी समधन (बेटी की सास) ने कहा भी था कि मौसम खराब है आज रुक जाईए पर त्रिभुवन जी ठहरे ठेट पुराने खयालों के आदमी भला बेटी के घर कैसे रुक सकते थे..? उनके लिए तो बेटी के घर का पानी तक हराम था पर इस बार वो थोड़ा  नए जमाने को अपनाते हुए पानी के साथ चाय नास्ता कर आये थे ,मगर बेटी के घर ना रुकना उनके लिए अभी भी सामाजिक सभ्यता थी, सो मौसम को अपनी नीयति मानते हुए ,बेटी की अश्रुपूरित विदाई को लेते हुए वो घर की और बारिश में निकल पड़े.. घर पहाड़ी के दूसरी छोर में था कई किलोमीटर पैदल चलना था रोड थी पर गाड़ियों का आवागमन समयनिर्धारित ही था ,, और आज बारिश हो गयी इसलिए गाड़ी के लिए यात्री नही होंगे और गाड़ी का मिलना नामुमकिन सा था ..पूस का महीना खत्म तो हो गया पर अभी ठंड मानो मानने को तैयार नही..त्रिभुवन जी थे तो लंबे पर उम्र ने थोड़ा कमर झुका कर उनके कद को छोटा कर दिया था बाल पूरे थे पर पके हुए , दाड़ी सफाचट,,. सर पे  गाँधी टोपी, माथे पर तिलक , एक कंधे पर कपड़े का थेला  ,और एक हाथ मे छाता , धोती ,कुर्ता ,ऊन की जवाहर कट जैकेट पहनें , छोटे छोटे कदमो से उनकी चाल नियमित थी.. ह बारिश और ठंड ऊपर से हल्का कोहरा तीनो ने मिलकर त्रिभवन जी की काया को उनकी उम्र का ऐहसास दिलाना शुरू कर दिया..त्रिभुवन जी काँपते हुए भीगते हुए गंतव्य की और दांत कटकटाते हुए बड़े जा रहे थे , शक्ति क्षीण हो रही थी, रास्ता अभी आधा भी नही नपा था दूर दूर तक कोई आश्रय ना था ऊपर से ठंड ने भूख को भी बड़ा दिया था..बारिश में रुक कर आराम भी नही कर सकते थे , क्या घोर संकट उत्पन्न हो गया था ,मन ही मन सोच रहे थे कहीं चाय की दुकान ही मिल जाये तो गरमागरम चाय से कुछ ठंड में राहत तो मिलेगी ,कम से कम दुकान में थोड़ा आराम तो मिलेगा , पर कहाँ? दूर - दूर तक बस कोहरा ही कोहरा ,आदमियों का कोई निशान नही ,,पर कुछ दूर जाने पर मानो भगवान को उनपर दया आगयी उन्हें एक आदमी अपने बैलों के साथ आते हुए दिखाई दिया , वे बेसब्री से उसके पास आने का इंतजार करने लगे वो पास आया तो त्रिभुवन जी ने कंपकपाती आवाज में कहा अरे भाई आस पास कोई बाजार है क्या ? कोई होटल ? कोई चाय की दुकान? आदमी ने त्रिभुवन जी की भेषभूषा और हालात देख के उत्तर दिया पंडित जी  बाजार तो नही पर अगर आप इस नीचे वाली पगडंडी से चलेंगे तो आपको  ऊपर गांव जाने वाले रास्ते मे एक चाय की दुकान मिलेगी , आगे ये पगडण्डी इसी रास्ते पर मिल जाएगी ,ये बोल कर वो आदमी थोड़ा ठहरा और बोला, पर वो दुकानआपके कामकी नही क्योंकि वो एक हरिजन (दलित) की दुकान है और आप ठहरे ब्राह्मण , आपके लिए तो बेहतर है आप इसी रास्ते पर चलते जाए..ये कहकर वो बैलो के पीछे पीछे चल दिया..त्रिभुवन जी के लिए विकट परिस्थिति आन पड़ी थी उन्होंने तय किया कोई नही, दुकान किसी की भी हो वहाँ कुछ नही खाऊँगा पर कम से कम बारिश के थमने तक रुक जाऊँगा थोड़ा आराम भी मिलेगा , ये सोचकर त्रिभुवन जी पगडण्डी पर चल पड़े दूर चलने पर उन्हें एक दुकान दिखाई दी जिससे धुँवा उठ रहा था उन्हें समझने में देर नही लगी कि ये ही वो चाय की दुकान है दुकान ज्योँ ज्योँ नज़दीक आ रही थी पकौड़े तलने की खुशबू तों तों तेज़ हो रही थी..त्रिभुवन जी की भूख ये खुशबू पहचानने लगी और और तेज़ वनाग्नि की तरंह त्रिभुवन जी के तन मन मे फैलने लगी ..मंत्रमुग्ध से त्रिभुवन जी दुकान में पहँचे , देखा चूल्हे पर एक अधेड़ उम्र का  आदमी पकौड़े बना रहा था , त्रिभुवन जी की आहट सुनकर वो उनके और देखते हुए मौन शब्दों से गर्दन झुका कर अभिनंदन करता हैं त्रिभुवन जी भी मौन रूप में गर्दन झुका कर अभिवादन स्वीकार करते हैं ।।त्रिभुवन जी की भेषभूषा से वो जान गया कि एक ब्राह्मण पंडित उनकी दूकान में आया है थोड़ा हिचकिचाहट भरे लहज़े में उसने कहा पंडित जी बैठिये आप भीग गए होंगे, त्रिभुवन जी भी मुश्कान देते हुए छाता बंद करते हुए  दुकान के अंदर घुस गए ,आज बारिश ने तो हद कर दी त्रिभुवन जी ने ये कह कर बातचीत की शुरुआत कर दी , आदमी ने कहा हाँ पंडित जी सुबह से बारिश थम नही रही ठंड में कोई बाहर निकल नही रहा ना आज कोई ग्राहक आया, मैं भी दुकान बंद कर के घर ही जाने वाला था पर सोचा अपने बच्चों के लिए थोड़े पकौड़े बना के ले चलता हूँ वो भी खुश हो जाएंगे...त्रिभुवन मुश्कान देते हुए उसकी हर बात का समर्थन कर रहे थे ..पर उनकी भूख मानो सभी सामाजिक ,धार्मिक व्यवस्थाओं से विद्रोह कर के पकोड़े खाने को उन्हें प्रेरित कर रही थी.. ऊपर से ठंड ,त्रिभुवन जी के मन मे द्वन्द शुरु हो गया ,  एक तरफ सामाजिक लोकाचार था एक तरफ ये तन की भूख..उनका मन एकाग्रता खो रहा था , और जब हमारा मन कोई कार्य करना चाहता है तो हम शास्त्रों ,धर्मग्रन्थ इत्यादि में अपने मन अनुसार बातों को खोज लेते हैं उनके मन ने भी सबरी और राम के प्रशंक को खोज लिया ..और कहा जब प्रभु राम बिना भेदभाव के सबरी के झूठे फल खा सकते हैं तो फिर में क्यों नही हरिजन के हाथ का बना नही खा सकता ,वैसे भी कर्म अनुसार ही जातिओं का विभाजन हुआ है और ये कर्म से खाना बना के सब को खिला  रहा है उस हिसाब से तो ये शूद्रों वाला  कर्म नही कर रहा फिर क्यों इस से भेदभाव करुँ..उनके मन ने उन्हें शंकराचार्य के अद्वेतवाद से लेकर मध्वाचार्य जी के द्वेतवाद का स्मरण करा दिया और वो अद्वेतवाद को मानते हुए सोचने लगे कि ब्रह्म तो सबमे विद्यमान है हम दोनों में तो कोई भेद ही नही, जो भेद है वो सब भ्रम है..मन जीतने लगा , त्रिभुवन जी ने लोकाचार को हराते हुए निर्णय किया कि वो पकौड़े और चाय पी ही लेंगे ,, वहीं उस आदमी के मन मे भी द्वन्द चल रहा था कि एक पंडित को कैसे आग्रह करूं ? भले ही मेरी दुकान में कई ब्राह्मणों ने चाय पी है पर वो सब पेंट जीन्स वाले ब्राह्मण थे ये तो धोती पहने पंडित जी है ..पर उसका मन भी उसे चाय बेचने पर मजबूर कर रहा था, उसका मन कहने लगा ,  बाजार में आ जाने पर कोई जाति धर्म नही होता बस एक ग्राहक होता है एक विक्रेता वैसे भी गीता में लिखा है कर्म किये जा फल की इच्छा ना कर, और मेरा कर्म है विक्रेता बन के धनर्जन करना और यदि मैं  ऐसे ही लोकाचार देखता रहा तो बच्चों को पालूंगा कैसे?..वैसे भी आजके पूरे दिन एक ही  आदमी आया है क्यों ना इसे ग्राहक बनाया जाए।।उसके मन ने भी लोकाचार को दरकिनार कर दिया उसने भी निर्णय कर लिया कि पंडित जी को पूछ ही लेगा चाय और पकौड़े के लिए...यहां दोनो निर्णय कर के ज्योँ ही आगे बढ़ने को थे तभी आवाज आई पंडित जी नमस्कार! आप यहां? सामने त्रिभुवन जी ने देखा कि उनके पास के ही गांव के पंडित उमाशंकर खड़े थे , त्रिभुवन जी ने कहा अरे उमाशंकर तुम यहां ,में तो लड़की को उसके मायके छोड़कर आ रहा था बारिश रुकने का इंतजार कर रहा था त्रिभुवन जी ने हड़बड़ा कर कहा...उमाशंकर ने भी जवाबमे कहा कि वो पास के ही गांव में पूजा करने आया हुआ था वो भी आज घर जा रहा था बारिश बहुत हो रही थी सो रुकने का आसरा ढूंढ़ रहा था..उमाशंकर भी अंदर आकर दुकान में त्रिभुवन जी के पास बैठ गए . यहां त्रिभुवन जी का मन उमाशंकर को गाली देने लगा , जो पानी मूँह में पकौड़े खाने के लिए आया था , वो पानी  भूख की आग शान्त करते हुए लुप्त हो गया ..लोकाचार हारी हुई बाजी फिर जीत गया था ,  कुछ देर बाद बारिश थमी त्रिभुवन और उमाशंकर दोनों उठ कर अपने गंतव्य के लिए साथ चल दिये..दुकान में बस ठगे से दो ही रह गए एक वो आदमी और एक त्रिभुवन जी का मन...और  सामाजिक लोकाचार जीत की खुशी में फिर हँस रहा था

..आशीष नौटियाल

....

Tuesday, 7 May 2019

अजीब दौर

मशाले जला के रास्ता दिखाओ यारों
उजाला अँधेरों में चलना चाहता है..
अजीब दौर है , हैरत मैं हूँ यारों
अमृत ,पी के जहर मरना चाहता है..


~~आशीष नौटियाल~~

Tuesday, 23 April 2019

-आड़ू के फूल-

-आड़ू के फूल-
मार्च का महीना, फरवरी की बची हुई ठंड को सुबह और शाम के पहरो में समेटते हुए शुरू हुआ,मौसम गुनगुना हो रहा था पर हवा में अभी भी ठंडक थी , मार्च ठंड को अलविदा  और गर्मी के आगमन की तैयारी कर रहा था  .बसंत का शुभारंभ हो रहा था नए फूल, नए पत्ते,  पेड़ -पौधे भी सजने को बड़े लालायित होकर झूम रहे थे ..पर बसंत हर किसी के लिए उल्लास का नही होता जैसे विद्यार्थियों के लिए ,,क्योंकि परीक्षा(exam) का आगमन भी इसी समय होता है.तो ये उल्लास विद्यार्थियों के चहरे पर आते आते चिंता और डर का रूप ले लेता है.ये समझलो ये बसन्त का एक प्रकार से side effect है .और ये ही भय और चिंता के भाव कुशाल  के चेहरे पर भी हैं ,जिसके स्नातक (graduation) के exam बस होली के तुरंत बाद शुरू होने को  थे। पर आज उसके चेहरे में डर से ज़्यादा उत्सुकता व हर्ष की लालिमा छा रखी थी हो भी क्यों नही?  गांव से पिताजी की चिट्ठी जो आ रखी है  ,क्योंकि  ये 1990 का जमाना है मोबाइल आये नही थे ,टेलीफोन सरकारी दफ्तर और कुछ सेठों के घर तक सीमित थे इसलिए चिठियों का दौर था और घर की चिठ्ठी आने का भाव शायद उस दौर का इंसान ही समझ सकता है इसलिए कुशाल आज भावुक था चिट्ठी को दस बार सूंघते हुए , अपने गांव की महक को लेते हुए उसने पत्र खोला और पढ़ा जिसमे पिताजी ने अपनी कुशलता लिखते हुए उसकी कुशलता हेतु भगवान से आग्रह लिखा था साथ मे  exam में खूब मेहनत करने को लिखा था , गाँव के समाचार में लिखा था कि गांव में सड़क बनने का कार्य 80 % पूरा हो गया है और शायद मई में पूरी बन के तैयार हो जाये ,कुछ खेत अपने भी आये है जिसके अच्छे पैसे सरकार ने दिए हैं जिस से घर मे लैट्रीन(toilet) बाथरूम बनाने का विचार है, आगे गर्मियां की छुट्टियों में उसका इंतजार रहेगा , ,कुशाल ने न जाने कितनी बार चिट्ठी को पढ़ा, रोया भी ,गांव को याद भी किया , और फिर कैलेंडर को देखते हुए मई का महीना निकाला और थोड़ा देखा ,तारीखे गिनी और फिर पुनः कैलेंडर को मार्च मे कर दिया  ,कुशाल जिसे घर मे प्यार या गुस्से दोनों से कुशी नाम से पुकारा जाता था, एक मध्यम वर्गीय परिवार से आता है पिता गांव में खेती  करते हैं और साथ मे दूध भी बेचते थे , देखा जाए तो खेती तो बस पेट भरने लायक थी असल आजीविका का स्रोत उनका दूध बेचना ही था .परिवार में 5 लोग थे कुशाल के माँ -पिताजी और 2 छोटे भाई बहिन , चूंकि गांव के पास कोई कॉलेज नही था तो कुशाल को 12 वी के बाद पढ़ने को शहर अपने चाचा के पास भेजा गया जो ड्राइवर का काम करते थे .कुशाल एक अन्तर्मुखी, गोल चेहरे व मध्यम कद काठी का नौजवान था ,स्वभाव से सरल , भावुक , उसमे आत्मविश्वास नाममात्र का था और हिचकिचाहट अधिक, इसलिए दोस्त भी कम ही बने , बचपन पहाड़ में बिता इसलिए पहाड़ उसके रग रग में बसा था , वह इस शहर में रहकर भी शहर में अपने गाँव को ढूंढा करता था , जहां sunday या किसी अन्य छुट्टियों में लड़के फ़िल्म देखने, क्रिकेट मैच खेलने या घूमने जाते ,ये शहर से थोड़ी दूर बने एक पार्क में जाता ,जहां वो प्रकृति को अपने पास पाता था जो उसे उसके गांव की याद दिलाता था , कभी कभी वो बस स्टैंड जाता अपने गांव की ओर जाने वाली बस को निहारता और भावुक हो जाता , और फिर दिन गिनता की कब exam खत्म हो और वो गाँव जाए , कहते हैं हर लड़की को अपना घर छोड़कर दूसरे घर यानी ससुराल जाना पड़ता है और उनका विरह, दुःख वो ही समझ सकती है पर शायद पहाड़ में ये विरह- दुख लड़के भी कई वर्षों से महसूस करते आ रहे हैं जो पढ़ाई, नॉकरी के लिए पराये शहर जाते रहे है.कुशाल के लिए भी ये ससुराल वाला विरह ही था ..वो कलेण्डर में हर बीती तारीख को पेन से काटता और बचे हुए दिनों को गिनता , उसे यूँ तो गाँव की हर स्मृतियां उसे भावुक करती थी मगर उसके घर के ऊपर की पहाड़ी में स्थित आड़ू का पेड़ उसे बहुत याद आता था ..याद आने की वजह यह थी कि ये पेड़ कुशाल के द्वारा ही लगाया गया था और लगाने की वजह ये थी कि कुशाल के चाचा और पिताजी के बीच जब घर और खेत का बंटवारा हुआ तो एक खेत की  सीमा तय करने खेत के किनारे में एक पेड़ लगाने का निश्चय किया गया जिस को आधार मान कर एक सीधी रेखा खींच के खेत की सीमा तय की जा सके ..अब पेड़ कुशाल ने लगाया था तो उससे भावनात्मक जुड़ाव स्वाभाविक था उसका बचपन और ये पेड़ साथ साथ बड़े हुए थे, गाँव के इसके साथ के लड़के पेड़ को  इसका बच्चा कह कर मजाक भी उड़ाते थे ,अब मजाक उड़ना भी लाज़मी था क्योंकि कुशाल की हरकतें ही कुछ ऐसे थी, उस पेड़ की वो ऐसे देखभाल करता था जैसे सच मे मां अपने बेटे की करती है उसपर किसी को चढ़ने न देना, बंदरों को आस पास फटकने भी न देना ,न जाने कितनी जंग उसकी बंदरों के साथ हो चूंकि थी , वह दिन में एक बार पेड़ के पास जरूर आता था , उसे उस पेड़ में सब से अच्छा तब लगता था जब उसमे हल्के सफेद हल्के गुलाबी फूल लगते थे, पुरा पेड़ एक गुलदस्ता सा लगता था और आड़ू के पेड़ में जब फूल लगते हैं तो उस समय पेड़ में पत्ते नहीं होते डालियॉँ में बिना पत्तों को बस फूल ही होते हैं मानो आड़ू के फूल स्वयं को इतना सक्षम समझते हैं कि उन्हें पत्तों की ओट स्वीकार ना हो .. कुशाल को  इसके फूल खिलने का सालभर ईंतजार रहता था, और जब फूल खिलते वो इस पेड़ के नीचे घंटों बैठा करता ,गर्मी में उसकी ठंडी छांव, और हल्की हल्की हवा उसे एक अविस्मरणीय सुखद एहसास देती थी , और जैसे जैसे इसके फूल फल में बदलते इसका चेहरा भी निराश होता जाता उसे फल से ज़्यादा पेड़ में बस इसके फूल पसन्द थे , वो फल से ज़्यादा इसके फूल को इस पेड़ का श्रृंगार समझता था , उसे फल का कोई मोह नही था , उसे बस वो प्रकृति की विस्मय करने वाली सुंदरता का मोह था .वो शहर के जिस पार्क में घूमने जाता था उसके पीछे उसके गाँव के आड़ू के पेड़ का आकर्षण ही था ।,  पार्क में खिले फूलों को देख कर वो उनमे अपने आड़ू के पेड़ के फूलों को ही ढूँढता था ,और कुछ समय के लिए वह पार्क उसे उसके गांव में होने का एहसास देता था.
मार्च के साथ मई भी खत्म होने को है गर्मी अपने चरम में है और गर्मी के साथ कुशाल के गाँव जाने की व्याकुलता भी ..exam खत्म हो चुके हैं और कल उसे इस गर्मी से भरे शहर से निकल कर सुहावने , ठंडी हवा लिए अपने गांव जाना था , सारा जरूरी सामान बांध दिया है. छोटे भाई बहन के लिए कुछ छोटी चीज़ें रख ली हैं..अब बस इंतजार है इस लंबी रात के खत्म होने का..वैसे गर्मियों की रातें छोटी होती है पर उसकी व्याकुलता ने उसे कई सदियों की बना दी थी..चलो जैसे तैसे करवटे बदलते बदलते रात कट गई..कुशाल तड़के ही बस स्टैंड गया ,अपनी गांव जाने वाले बस में बैठा और चल पड़ा जैसे पहली बार ससुराल से वधू मायके वापिस आती है कुशाल के भाव भी कुछ यूं ही थे ..जैसे जैसे शहर छूटता गया वैसे वैसे गाँव के चित्र उसके दिमाग मे आने लगे , आखिर वो गांव के अपने बाजार आ गया वहाँ से दूर पहाड़ी में उसे अपने गांव की पहली झलक मिली, उसने एकटक गांव देखा और भावुक होकर ,कुछ पल निहारकर पैदल ही गाँव के लिए निकल पड़ा, उसने देखा गांव के पगडंडियों की जगह एक सड़क ने ले ली थी ,सड़क बन तो गयी थी पर अभी ऊबड़खाबड़ थी और उसमें अभी कोलतार बिछना बाकी था इसलिए गाड़ियों का आवागमन नही था शायद 2, 3 महीनों में उसमे गाड़ी भी चलने लगे और कुशाल अगली बार आये तो गाड़ी से सीधा अपने गांव चला जाये।।खैर कुशाल पैदल ही उस सड़क के साथ साथ गांव की और चलने लगा हर खेत, हर पेड़, हर पत्थर को निहारते हुए , खुश होते हुए की वापिस ये सब देख रहा हूँ कुछ भी नही बदला, हाँ सड़क से रास्ते मे कुछ परिवर्तन आया है पर आस पास वैसा ही है,, गांव के कुछ लोग रास्ते मे मिले कुशाल को देख के रुके , कुशाल ने नमस्ते करते हुए हाल जाना ,उन्होंने भी कमजोर हो गया है, लंबा हो गया है इत्यादि  टिप्पणी कर के प्रारंभिक मुलाकात कर अपने रास्ते लग गए , गाँव धीरे धीरे नज़दीक आ रहा  था और इसकी उत्सुकता बड़ती जा रही थी , गांव से पहले ये नई सड़क उसे उसी खेत मे ले गयी जहां इसका प्यार से पेड़ स्थित था , कुशाल भी एक माँ के जैसे अपने बेटे को देखने को आतुर था वो लंबे लंबे कदम भर के सड़क के साथ खेत की और चल रहा था , इंतजार खत्म हुआ और वो खेत मे जा पहुंचा बड़े उत्सुकता से उसने पेड़ की तरफ देखा . पर ये क्या ! पेड़ तो नदारद था , कुशाल को एक सेकंड भी ना लगा ये समझने को की इस सड़क ने उसके प्यारे पेड़ की बलि ले ली है. उत्सुकता और खुशियां गायब हो चुकी थी, उसने आजतक अपने परिवार के किसी भी सदस्य की मृत्यु नही देखी थी  .पर आज उसने उस भाव को महसूस किया जब परिवार का कोई गुजरता है तो वो दर्द वो पीड़ा बस परिवार के सदस्य ही जानते है , उसी प्रकार की पीड़ा, भाव से अभी कुशाल पीड़ित था , वो रोना चाहता था पर रो नही पाया शायद उसने सोचा  पेड़ के प्रति ये भाव देख कर लोग और उसका मजाक उड़ाएंगे .वो मौन रहा ,पेड़ के अवशेषों को नजरों से निहारते हुए  , थोड़ी देर उस स्थान पर बैठा रहा जहां पेड़ था . और फिर निराश भाव लेकर चल दिया , वो अब इतना बड़ा हो चुका था कि अपने  स्वाभाविक भाव को चेहरे के  बनावटी भावों में बदल सके .अंदर दर्द और चेहरे पर मुस्कान लिए वो अपनी घर की और चल दिया..घर पहुंचने पर क्या हुआ ये हमारा विषय नही है , छुट्टियों के इस प्रवास में जीवन ने उसे एक नया मोड़ दिया था ,और कुशाल की इस उम्र में यदि कोई बात, सबक दिल पे लग जाये तो वो ता -उम्र के लिए व्यक्ति की सोच की दिशा बदल देता  है . कुशाल के साथ भी ऐसा ही हुआ उसने अपने पेड़ के प्रति लगाव ने , उसकी प्रकृति के प्रति सोच में बदलाव कर दिया सड़क ने उसके ही नही न जाने कितनों के पेड़ों की बलि ली होगी , विकास हम रोक नही सकते पर विकास के side effect से होने वाले परिणामो को हम कम कर सकते हैं.. 
बस एक सुबह जब गांव के लोग एकत्रित थे ग्राम प्रधान, स्थानीय नेताओं , इत्यादि लोगों को गांव तक सड़क लाने के लिए सम्मानित करने के लिए , कुशाल चुपचापअपने खेतों में गया और चार अलग अलग फलों के पेड़ लगाए , और बाकी छुट्टियां उन्हें सींचता रहा..
आज फिर मई का महीना  है कुशाल second year की परीक्षा दे कर छुट्टियों में गांव जा रहा है..अब गांव की सड़क में मोटर कार चल रही थी वो फिर भी पैदल अपने गांव की और चला , गांव आया तो पाया उसके लगे पेड़ लहलहा रहे थे , आज उसके मन के भाव वैसे ही थे जैसे नवजात के जन्म लेने पर माँ के होते हैं आज भी वो मौन ही था ,आज भी पेड़ में बंदर थे पर आज उसने उन्हें भगाया नही क्योंकि वो जान गया था पेड़ों के श्रृंगार में इनका भी योगदान है ..और इन छुट्टियों में भी चार पेड़ और लगाने की सोचते हुए घर की और चल दिया ..

【आशीष नौटियाल】



Tuesday, 5 March 2019

ना अंधेरा, ना उजाले सा हूँ, हाँ तुझ बिन ,अधूरा उस साँझ सा हूँ.. ~~आशीष नौटियाल~~

ना अंधेरा,
ना उजाले
सा हूँ,
हाँ तुझ बिन ,अधूरा
उस साँझ
सा हूँ..

~~आशीष नौटियाल~~



Sunday, 10 February 2019

रूठ लो

रूठ लो हमसे
तुम कितना भी ज़िन्दगी..
तुझे मनाने का ना सही
खुद को बहलाने का
हुनर सीख गए हैं..

~~~आशीष नौटियाल~~~

Friday, 8 February 2019

Tum hi nahi

तुम ही नही ,
तुम्हारा एहसास
भी अब हमे छलता है..

चहूँ ओर छाया तिमिर है,
फिर भी हमे
उजाला लगता है

~~आशीष नौटियाल~~

Khusboo meri

सजा के रखा 
कोने में,
दूसरों को 
दिखाने के लिए,
मुरझाने पर मुझे 
फेंक आये थे जो
वो पागल अब,
 खुशबु मेरी 
इत्रों में खोजते हैं

~~आशीष नौटियाल~



Tuesday, 5 February 2019

चुप चुप से तुम

चुप चुप से तुम
कुछ दिनों से
पत्थर बन गए हो..कह दो,
इस पतझड़ में शायद
तुम भी घरौंदा
बदल रहे हो

~~आशीष नौटियाल~~

Thursday, 10 January 2019

डोर और पतंग

बेपरवाह वो एक पतंग
उड़ान चाहे अब मस्त मलंग
डोरी से वो लड़ पड़ी
उससे वो कह पड़ी..

तेरी धुन में क्यों में नाचूँ?
घूमूंगी स्वयं स्वछंद गगन.
सुन रे कटपुतली नही हूँ,
ना ही तेरे हाथों का कंगन..

जैसे तू नाच नचाये
अब न वैसे डोलूँगी.
परतंत्र हरगिज स्वीकार नही.
स्वतंत्र राष्ट्र में अब तो बोलूंगी.

डोर ने ढीली कर दी बाहें
बोली जा उड़ ले आसमान में..
पर इस आसमान का अंत नही
तुझे कैसे समझाऊँ में.

तू ने समझा तू स्वयं उड़ती है
मेरी बाहों का कोई मोल नही
तेरे सफ़र में मैं भी था
सारी उड़ाने सिर्फ तेरी नही

डोर ने छोड़ा, पतंग उड़ी.
गोता खा के सँभली. संभल के
फिर लड़खड़ा के गिरी..

आसमान छूने का ख्वाब छूटा.
न जाने कितनों ने उसे लुटा ,,
छलनी छलनी  फटी फटी वो
दूसरे पल जमीं पर पड़ी वो

~~~आशीष नौटियाल~~~

Wednesday, 9 January 2019

बिजली की तार में, उलझी हुई पतंगो ने .. तेरे शहर का मिजाज बयां कर दिया.. ये पंख तो देता है मगर, उड़ने को आसमां नही ~~आशीष नौटियाल~~

बिजली की तार में,
उलझी हुई पतंगो ने ..
तेरे शहर का मिजाज बयां कर दिया..
ये पंख तो देता है मगर,
उड़ने को आसमां नही
~~आशीष नौटियाल~~

Saturday, 5 January 2019

शोर बहुत है गली में, तभी तुम्हे पता ना चला, मेरे इस खामोश मकान में , चीखें बहुत बोलती हैं... ~~~आशीष नौटीयाल~~

शोर बहुत है गली में,
तभी  तुम्हे पता ना चला,
मेरे इस खामोश मकान में ,
चीखें बहुत बोलती  हैं...
~~~आशीष नौटीयाल~~