ना थी दीवारे जिसके घर की खड़ी..
हर मौसम से वो अपने नंगे बदन लड़ी
फटी जेब में उसके बस रूपये दो चार थे ..
मेरी माँ की आँखों में मगर सपने हजार थे..
रह रह कर भूखा उसने भूख को हरा दिया..
मेरे लिए उसने अपने तन को सूखा दिया..
खाल में बस अब हड्डियों के ही निशान थे.
मेरी माँ की आँखों में मगर सपने हजार थे..
स्वेटर नहीं उसने मेरे कल के सपने बुनेे..
जला के देह अपनी मेरी ख़ुशी के मोती चुने..
त्यौहार सारे हमारे बस नाम के थे..
मेरी माँ की आँखों में मगर सपने हजार थे..
हे ईश कहीं उसके इरादों में.
झलक जाता है वो उसकी कर्मठता मैं..
मेरे लिए वो ही मंदिर और मस्जिद थे..
मेरी माँ की आँखों में मगर सपने हजार थे..
है माँ तेरी उमींदों को न झुकने दूँगी..
हर सपना हो तेरा सच ये प्रण करूंगी..
है तू मेरा ईश और मैं विश्वास तेरा.
लाऊँगी उजाले की अब न होगा अँधेरा..
~~~आशीष नौटियाल~~~
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