Friday, 21 December 2018

आईने कई है दुनियां की दीवारों में ,मगर
खुद से रूबरू, बस तेरी आंखों से होता हूँ
~~~आशीष नौटियाल~~

Monday, 17 December 2018

विरह

श्याह रात,
बुझे चिराग,
लापता चाँद..
गुमराह तारे..
अँधेरा पुनः जीवित  हो चला..

जगे दर्द
घाव हरे 
रूठी नींद
आँसू बहे
 विरह का जहर चढ़ चला.

~~~आशीष नौटियाल~~~

Wednesday, 5 December 2018

~पल~

पल जिसमे हम थे, में उसे जी चुका था , उसका नशा मुझसे उतर चुका था , में उसे छोड़ आगे बढ़ना चाहने लगा शायद जैसे प्यास के बुझ जाने में पानी का महत्व उतना नही रहता जितना प्यास से पहले होता है वैसे ही मुझे उस पल के प्रति आसक्ति ना रही..ना अनुराग, वो पल चुप था, मगर उसकी चुप्पी मानो मुझ से कुछ कह रही थी की फिर जी ले मुझे,शायद बाद में मैं यहां ठहरूं नही , पर  में तृप्त था ,सम्पूर्ण था ,अब मानो मुझे वो पल माया, भ्रम, मिथ्या लगने लगा ,मुझ में उसके प्रति वैराग्य उत्पन्न हुआ और उसके प्रति एक उदासीन भाव ले कर में समय के साथ उड़ चला .


गुजरे समय ने पीछे छुटे पलों का एक टीला सा बना दिया ,परत के ऊपर एक परत चढ़ती चली  गयी , फिर किसी रोज जब समय के साथ मे दौड़ते दौड़ते जब मैं थक गया , समय की गति से मेरे कदम कुछ पीछे रहने लगे..में हाँफने लगा .. थक के चूर मैने समय को जाने दिया,में रुकना चाहता था थोड़ा आराम करना चाहता था तभी  मुझे अपने पीछे अपने जीये पलों का टीला नजर आया में समय से पीछे दो कदम चल कर उस टीले पर चढ़ के  बैठ गया ,कुछ देर में यादों की ठंडी हवा चलने लगी ,मुझे राहत महसूस हुई मेरा पसीना सूखने लगा ,मैने महसूस किया हवा में जानी पहचानी सी महक आ रही थी ,  मेरा मन उस महक से जुड़े पल को उकेरने लगा परत दर परत उखाड़ के में उसे ढूढ़ने लगा , यादों की हवा और तेज़ हुई और साथ मे वो महक भी उन चक्रवर्ती हवा ने टीले की परतों को उखाड़ के अलग कर दिया और वो महक तेज़ होकर मेरी स्मृतियों को अपना परिचय देने लगी , मुझे याद आया ये महक उस ही पल की है जिसे में छोड आया था ,जो मेरा वैराग्य था  वो शमशानी वैराग्य लगने लगा, फिर व्यास लगने लगी, आशक्ति बढ़ने लगी..में उस पल के लिए फिर अनुरागी हो गया ,में तड़पने लगा , उस पल को उस टीले में खोजने लगा , काफी परतों के बाद वो धूल मिट्टी से सना पल मुझे दिखाई दिया में लपक के उसे पकड़ना चाहा पर वो रेत हो चुका था जैसे ही पकड़ूँ फिसलने लगा .. वो अब मृत था उसके बस अवशेष ही मेरे हाथों में थे ,में कैसे फिर जीता इसे,, रेत से कैसे प्यास बुझती , पल-पल वो पल याद आने लगा , जितना आये उतना सताने लगा , भ्रम अब सच्चा लगने लगा , पछताऊं, रोयूँ, मनाऊं खुद को..जोगी अब रोगी हो गया..जो पल था वो हमेशा के लिए कहीं खो गया


~~आशीष नौटियाल~~




Monday, 26 November 2018

खालीपन

तुम जो देखते हो मुझे..

खिलखिलाते हुए ,..

मस्ती में चूर , ज़िन्दगी जीते हुए..

शायद तुम्हें पता नही..

खाली कमरों में गूँज ज़्यादा होती है

~~~आशीष नौटियाल~~~

Thursday, 22 November 2018

ऐ हवाओं बेगैरत होकर , मुझ से रिश्वत ले लो. और उड़ा के जुल्फे उनके रुखसार से.. उनका दीदार करा दो. ~~आशीष नौटियाल~~

ऐ हवाओं बेगैरत होकर ,
मुझ से रिश्वत ले लो.
और उड़ा के जुल्फे
उनके रुखसार से..
उनका दीदार करा दो.

~~आशीष नौटियाल~~

Wednesday, 21 November 2018

अदाकारी

उसे इश्क था मुझ से 

ये सच तो ना था..

पर अदाकारी इश्क की 

वो उम्दा निभा गया ..


ना छोड़ा, ना लड़ा, 

ना कुछ कहा मुझ से..

बन के बुत, हमारे रिश्ते को

बेसुरा साज कर गया.


इस साज मैं इश्क़ का गीत

हम गाते कैसे.

हम ही छोड़ चले  ..

बन के वो वफादार

बेवफ़ा हमे कर गया.


~~आशीष नौटियाल~~



Thursday, 15 November 2018

खूबसूरत

मेरे चेहरे पे अब कहाँ
खूबसूरती दिखती है...
और जो  देखे मेरा दिल ,
वो नजर अब कहाँ मिलती है...
~~~आशीष नौटियाल~~~

Monday, 12 November 2018

लौट चल

लौट चले हैं परिंदे भी अब अपने
               ठिकाने..
ऐ दिल तु भी लौट आ करके कुछ
               बहाने..
क्यों है वहाँ जो है पराया,लगा है तुझे
                सताने..
बसंत ले कर दे गया सावन ,आँखों को
               भीगाने..
ऐ दिल तु भी लौट आ कर के कुछ
                बहाने..
लौट चले हैं परिंदे भी अब अपने
                ठिकाने..

~~आशीष नौटियाल~~

Monday, 22 October 2018

यादें

यादों की बारिश में ,
टपकी है आँखों से बूंदे फिर से..
मेरे दिल की छत में
तेरे खालीपन का सुराक
अभी भरा नही है..
~~~आशीष नौटियाल~~~

Friday, 12 October 2018

माँ सा

रिवायतों से देखा
तेरा मजहब,लिबास
खुद से अलग पाया..
ईमानदार सीरत से देखा
तेरा चेहरा हर नक्श से
अपनी माँ सा पाया..
~~~आशीष नौटियाल~~~

Thursday, 11 October 2018

पलायन

कैसे देवभूमि है अपनी 
जो तेरे बंजर मकान में भी
फूल खिला रही..
और एक तू है .
परदेश चला गया है
खुद को खिलाने के लिए..

कन देवभूमि ची अपरि
जु तेरा बाँझा कुड़ा मा भी
फूल ची खिलाणी..
यो तू ची
बिरणा मुल्क जयूँ ची..
खुद खिलणों तें..
~~~आशीष नौटियाल~~

Thursday, 4 October 2018

ज़माना

उड़ती धूल ,फिर ज़मीन पे आ गिरी..
ऐ हवा तू भी ज़माने की तरंह निकली..
~~~आशीष नौटियाल~~~

Wednesday, 3 October 2018

हाथ की लकीरें

हाथ की लकीरें
मेरे चेहरे में उभर आई हैं..
अब किसी से पूछना क्या   .
मेरे नसीब में क्या है ?
~~~आशीष नौटियाल~~~

Monday, 1 October 2018

क्या दूँ

रिक्त हूँ कुछ दे नही सकता..


पर कुछ गुनगुनी धूप 


बचायी है मैंने जाड़ों की,


 तेरी नम आंखों को सुखाने के लिए..


कुछ लड़कपन की शैतानियाँ ,


कुछ खेल,  कुछ खिलौने संजोए है मैंने,


तेरे होंठों पे हँसी खिलाने के लिए..


रास्तों से कुछ पगडंडियाँ ,


  कुछ कदम छिपा रखे हैं..मैंने,


तेरे संग संग राहों में चलने के लिऐ.


महफिलों से नज्म, शायरों से शायरी


कुछ कतरने कागज की ,और कुछ श्याही


इकट्ठा की है मैंने,


 तेरे रूप को गढ़ने के लिए..


मीरा का समर्पण, गोपियों का विरह.


सबरी के राम, राधा का कृष्ण


हर भाव से खुद को भरा है मैने


तुझ से प्रेम करने के लिए..


~~~आशीष नौटियाल~~~





 


Friday, 28 September 2018

रंग दे

रंगरेज़ रंग दे
किसी भी
रंग में कपड़ा मेरा,
अब दागदार सभी 
सफेद पहनने लगे हैं
~~~आशीष नौटियाल~~~

खाकी और खद्दर

खाकी और खद्दर
ये कपड़ा कम बिकता है..
पर जो पहने इसे..
वो जल्दी बिकता है..
~~~आशीष नौटियाल~~

Thursday, 27 September 2018

दढ़ियल

उस को भाता दढ़ियल सइयाँ..
अपना सफाचट मैदान है..
हमने सोचा हम भी उगा दे
खेत तो ये सारा अपना है..
श्याम वर्ण हूँ भूल गए हम .
खेत भी अपना काला है..
काले चाँद पे श्रृंगार काजल का
रूप अब अपना निराला है..
भागे डर के यक्ष किन्नर गंधर्व सब
अब काल भैंस पे सवार है.
वो स्वेत वर्ण खड़ी थी सम्मुख.
प्रेम का आज इम्तिहान है.
देख के वो हो गयी मूर्च्छित,
स्वेत वर्ण उसका अब नीला है.
इश्क हमारा उड़ गया  भाप सा.
फिर खाली अपनी गागर है.
हुए सफ़ाचट फसल काट के.
काला चाँद अब चम्मकता तो है
~~~आशीष नौटियाल~~~

Saturday, 22 September 2018

सुख

चमकते बाज़ार में सजा सुख..
धन से जो मिलता..
अल्प है,,विनाशी है ,असत्य है
मिले जो सुख धन से तो
सिद्धार्थ कभी "बुद्ध"
वर्द्धमान कभी "महावीर" ना बनता..
~~~आशीष नौटियाल~~~

Saturday, 15 September 2018

बाजार में थे ...

बाजार में थे कभी जो रुपए के तरंह..

सिक्के वो अब सारे आने हो गए..


गांव का पीपल अब अकेला रहता है.

चौपालें वो सभी मयखाने हो गए..


कौड़ियों में यहां इंसानियत है बिकती.

कौन कहता है बाजार सारे महँगे हो गए?


सीता की तरह दफन है सभी सच्चे

झूठे अब सारे  यहाँ श्रीराम हो गए..


चीर हर के दुर्योधन बना है मंत्री.

लाज रखने वाले कृष्ण बदनाम हो गए..


तुझ पे पैसा तो तू ही अब खुदा..

मठ, मंदिर, आश्रम सारे बाजार हो गए..


कमाता है तु , तो तेरे हैं  सब अपने .

रिश्ते सभी अब व्यापार हो गए..


बरस के जो बुझाए व्यास धरती की..

अब वो बादल सारे आवारा हो गए..


मंडी में चापलूसों की है ऊंची कीमत..

ईमानदार यहां सभी सड़े आम हो गए..


चल जी लेते हैं यहां गूंगा अंधा बन के..

कोई कह न दे तू और मैं पागल हो गए..


~~~आशीष नौटियाल~~~




Saturday, 8 September 2018

आज और कल

वो ऑफिस से घर की ओर निकला ही था की बारिश की बूंदों ने उसे भीगाना सुरु कर दिया ,अपने को बचाते हुए उसे ने एक बंद दूकान के छज्जे के नीचे शरण ले ली और सोचने लगा दिन भर तो बारिश का पता नहीं था जैसे ही मेरा घर जाने का समय हुआ वैसे ही मुझे भीगाने आ गयी ना जाने क्या दुश्मनी है कल तक छाता लाता था तो ये आई नहीं आज नहीं लाया तो सरपट आगयी ,,और इन्द्रदेव को कोसते हुए वो भीगती सड़क और पानी उछालती गाड़ियों को देखने लगा वो चुप था मगर उसके ख्याल उसे से बातें करने लगे की आज गाडी पास होती तो बिना भीगे घर पहुँच जाता  यार कार ले तो सकता हूँ 3 लाख की आ जायेगी किस्तों में भी ले सकता हूँ ,फिर ख्याल आया की सपना तो मेरा नौकरी लगने के बाद एक बुलेट लेने का था, उसमे  क्या रौब जमता है फट फट की आवाज में हॉर्न मारने की भी जरूरत नहीं और कॉलेज के दिनों से ये ही तो सपना पाला था ..साला 3 साल हो गए नौकरी लगे अभी तक तो में ले सकता था और एक लदाख का ट्रिप भी कर चूका होता ..तभी टयूशन से घर जा रहे बच्चों पर उसकी निगाह पड़ी वो बच्चे बिना किसी फिक्र के मस्ती में.. झूम झूम के, पानी उछालते हुए, बारिश में भीग के घर जा रहे थे उन्हें देख, उसने सोचा यार ये ही बचपन के दिन अच्छे थे काश मैं भी अभी इनके जैसे होता तो भीग के मस्ती करते हुए जाता ..ऐसे ही निहारते निहारते बारिश रुक गयी और वो भी अपने घर की ओर निकल पड़ा ..पर वो पल उसी छज्जे के नीचे सोचने लगा की ये कभी तो  भीगना नहीं चाहता गाडी की ख्वाइश कर रहा है और एक पल में बच्चों जैसे भीगना चाहता है ,  और वो दोनों कर सकता है पर इनसब को करने से उसे कौन रोक रहा है ? कार भी वो ला सकताहै और बच्चों जैसे भीगने के लिए बचपन में जाने की जरूरत नहीं वो आज भी भीग सकता था ,पहले उसे ही तय करना है वो भीगना चाहता है की नहीं ...असल में उसे आज जीना नहीं आता वो कल के लिए जी रहा था,, वो अपने लिए बच्चों जैसे भीग के जाना चाहता था और समाज के लिए वो बिना भीगे एक कार में ..और वो अपने आप से  और सामाजिक status दोनों के द्वंद में अपना आज खो रहा है ..और कल का कोई भरोसा नही होता।

~~आशीष नौटियाल~~ 

Wednesday, 5 September 2018

तुम जो गए हो

तुम जो गए हो ,
कभी ना लौट आने को..
सत्य है , मुझे है पता
अब तुम कभी लौटोगे नही..
पर ये इंतजार तुम्हारा भाता है मुझे.
क्योंकि इसमें तुम हो ,में हूँ , और कोई नही.
ऐसा एकांत हमदोनो को मिला ही कहाँ था..
अब बस तुम हो, मैं हूँ, और कोई नही..

~~~आशीष नौटियाल~~

Monday, 3 September 2018

नभ और मेरी आँखें


नभ और मेरी आंखें..
दोनो है आज लालिमा लिए ..
प्रेम में व्याकुल हैं हम दोनों ,
वो धरा के लिए में तुम्हारे लिए ..
~~~आशीष नौटियाल~~~

Sunday, 2 September 2018

निशानची

~~निशानची (कहानी)~~

आज सुदूर हिमालय के इस सीमावर्ती गांव में कुछ हलचल सी है क्योंकि महिलाओं का एक दल जो जंगल मे घास लेने के लिए जंगल की ओर जाने को तैयार था, आज उसमे एक निर्णात्मक फैसला होने जा रहा था , फैसला ये की  विमला के लिए अब से रुका जाए या नही ...क्योंकि उसकी लेटलतीफी से हर रोज घास लेने में देरी हो जाती है और आज महिलाएं निर्णय करने हेतु दृढसंकल्प होकर चौपाल में एकत्रित हैं....उनकी चौपाल स्थित है गांव के ही पास पानी के स्रोत्र के निकट खड़ा एक तिमला(अंजीर) का पेड़…इसी जगह में सभी गांव की महिलाएँ एकत्रित होकर जंगल की ओर जाती है ,ये पेड़ इतना छायादार तो नही पर इसकी जड़ में पड़े एक चिकने पत्थर ने घास लेने जानी वाली महिलाओं के लिए इसे मूल्यवान बना दिया था, क्योंकि जंगल जाने से पहले अपने दाथी(,घास काटने का हथियार) की धार तेज़ करने हेतु ये पत्थर  उनके लिए उपयुक्त था ..और साथ ही पत्थर चौड़ाई में बड़ा भी था तो ये विभिन्न प्रकार के इस्तेमाल में खरा उतरा ,ये प्रतिक्षालय भी बना ,विश्रामालय भी..चौपाल भी और गपसप करने की जगह भी ..इसी पत्थर पर गांव की महिलाओं ने पहले भी कई क्रांतिकारी निर्णय आपसी मत से  लिए थे इसलिए इसे यदि इसे गांव की  महिलाओं की संसद कहा जाए तो अतिश्योक्ति नही होगी..खैर आज का मामला विमला से जुड़ा है तो विमला के बारे में थोड़ा प्रकाश डालते हैं  ,विमला जो अभी एक साल पहले ही इस गांव में  ब्याह के आयी है शारीरिक रूप से थोड़ा कमज़ोर है इसके पीछे की वजह ये है कि इसके जन्म के कुछ माह के उपरान्त ही इसके सर से माँ का साया उठ गया था ,विमला को दादी ने लाड़ से तो पाला मगर उसे पोषित करने वाले दूध की अल्पता ने इसे अपने 2 भाई 1 बहिन में सब से दुर्बल बना दिया ..इसका परिणाम ये हुआ कि जो कार्य करने में किसी को 1 घंटा लगता था, तो वोही काम विमला करे तो उसे 2 घंटे लगते थे ..इसी वजह से बचपन से उसका उपहास उसके गांव के संगी साथी उड़ाते रहे अपने गांव में वो एक आलसी,, कामचोर.. कई नामों से कहलायी जाती थी  हालांकि वो कामचोर नही थी बस उसकी गति धीमी थी ,वो किसी कार्य से जी नही चुराती थी बड़ी तल्लीनता से वो हर कार्य करती थी बस सामर्थ्य ना होने के कारण वो कार्य को निपूर्णता से नही कर पाती थी, लोगों के उपहास के कारण उसके स्वभाव में एक अकेलापन आ गया ,वो मुखर ना हो पाई और हीन भावना से ग्रसित होकर  अपना आत्मविश्वास खोती गयी, ऊपर से दादी द्वारा बार बार ये कहना कि इस से को शादी करेगा, काम  तो इस से होता नही,, रात दिन दादी की इस चिंता ने भी उसे अंदर तक दुःखी कर दिया था  क्योंकि ये समय तक़रीबन सन1948 से 1962 का है जहां समाज मे वो ही महिला कार्यकुशल मानी जाती थी जो घर, जंगल, खेत, गाय भैंस, को अच्छी तरह से संभाल सके ..जिसके सर में घास  या लकड़ी का जीतना बड़ा गट्ठर होता था वो उतनी ही कार्यकुशल, निपुण समझी जाती थी  , महिलाओं को शिक्षित करने की सोच अभी समाज मे व्याप्त नही थी ..अतः ये घरेलू कार्य करने की कुशलता ही उनकी MA की डिग्री थी..और अपनी विमला इसमें फिस्सड़ी ..खैर विमला सब काम मे फिसड्डी तो थी पर उस के अकेलेपन ने उसे ध्यानकेन्द्रित करने की अनोखी शक्ति दे दी थी और ये शक्ति का वो सबसे अच्छा उपयोग अपने घर के पास खड़े अपने पसंदीदा आम के पेड़  पर आम तोड़ने के लिए करती थी ..पेड़ एक नुकीले चट्टान पे था तो उस पर चढ़ के आम तोड़ना आसान तो ना था पर विमला जो अपने जान से प्यारे आम के लिए कुछ भी कर सकती थी, तो उसने पत्थर से दूर से निशाना लगाना सीख लिया .आम किसी भी ऊंचाई और घनी टहनीयों के बीच हो विमला के एक या दो सटीक वार से आम तपाक से नीचे आ जाता था ..पर ये उपलब्धि से भी उसे कोई फायदा ना था क्योंकि उसे सुनने को ही मिलता था कि देखो! आम तोड़ने में तो कैसे फुर्ती आ जाती है इसे ,और घास ,लकडी, खेत का काम हो तो केंचुए की तरंह रेंगती है ..दादी भी कहती कि 24 घंटे उस आम के पेड़ में क्या करती है क्या ससुराल में भी पत्थर मार के अपने सास का सार फोड़ के खाएगी? ,अब विमला की कार्यकुशलता अनुसार विमला के लिए उसीप्रकार घर ढूंढा गया, जिसमें घर कार्य ना के बराबर हो सो विमला की शादी के लिए इस गांव के धानीराम का घर चुना गया धानीराम की माँ थी नही बाप था वो भी बीमार सा बस हुक्के को अपना जीवनसाथी मानकर बची ज़िन्दगी गुजार रहा था ..धनीराम खुद पटवारी के यहां चपरासी का कार्य करता था घर से सम्पन्न नही थान इसलिए खेती भी नाममात्र की थी घर मे भैंस नही थी पर एक गाय थी ..कुलमिलाकर घर का कार्य ना के बराबर था ..धानीराम भी स्वभाव में सरल था और विमला के लिए उसका स्वभाव सामान्य ही था क्योंकि वो जानता था वो घर से सम्पन्न नही है8 इसलिए उसे विमला जैसा जीवनसाथी मिलना ही उसकी किस्मत में था, और कभी कभी आपकी गरीबी आपको संतोषी भी बना देती है बस वो एक सामान्य संतोषी व्यक्ति था विमला उसके लिए बस अन्य पारिवारिक सदस्यों की तरह ही थी..सास थी नही इसलिए विमला कार्य भी अपने अनुसार अपने समय पर करती थी फुर्ती थी नही इसलिए घास लेने जाने हेतु उसे रोज ही लेट होना पड़ता था और उसकी वजह से गाँव की औरतों को भी ..क्योंकि जंगल मे नरभक्षी बाघ और भालू का खतरा बना रहता था इसलिए गांव की महिलाएं एकत्रित होकर सामूहिक रूप से जंगल की और घास लेने जाति थी..पर अब वो सब विमला की लेटलतीफी को सहन नही करना चाहती थी ..औरतों का मत था इसकी सास तो है नही वो तो मजे से आएगी हमे तो घर जा के सास की डाँट रोज इसकी वजह से सुनी पड़ती है ..संसद तिमले के पेड़ में बैठ चुकी थी इन महिलाओं का नेतृत्व कर रही थी चंदा ..नाम तो चन्दा था मगर रंग रूप में वो बस औसत थी शायद उस के मुख के गोल बनावट की वजह से उसका नाम चांद पर रख गया हो , विमला और उसका विवाह एक ही महीने के अंदर हुआ था इसलिए वो विमला से प्रतिस्पर्धा रखती थी वैसे प्रतिस्पर्धा दोनों में थी ही नही कहाँ कमजोर विमला कहाँ बिजली सी फुर्ती वाली चंदा , चूँकि दोनो एक ही समय मे इस गाँव मे आयी थी तो चंदा सर्वश्रेष्ठ नवविवाहिता का ताज पहने के लिए उससे प्रतिस्पर्धा करने लगी ..चंदा गांव के प्रधान की बहू थी जिसके यहां 2 गाय,, 2 भैंस,, कई बकरियाँ,, खेती भी खूब थी ,सम्पन्न परिवार था और संपन्न परिवार की बहू होने का घमंड भी उस मे कूट कूट के भरा था ..और उसे विमला का मजाक उड़ाने और उसे नीचा दिखाने में बड़ा मजा आता था..प्रतिस्पर्धा केवल चंदा की तरफ से थी विमला को तो पता था उसकी शारिरिक दुर्बलता से वो चंदा क्या गाँव की बूढ़ी औरतों के बराबर भी नही ..उसे चंदा की किसी बात का कभी बुरा नही लगा ..क्योंकि बचपन से उसे इन सब की आदत थी उसके लिए नया कुछ भी नही था ,पर कहते हैं ना सबल को हमेशा निर्बल को सताने में मजा आता है चंदा भी इसी दृष्टिकोण से विमला से व्यवहार करती थी..चंदा संसद में ज़ोर ज़ोर से कहने लगे गयी कि अब पानी सर से ऊपर हो चुका है हमने विमला को  पहले भी बहुत समय दे चुके है उसे तो एक गाय के लिए चारा लाना पड़ता है हमे तो  4..4 पशुओं के लिए चारा लाना पड़ता है ..अधिकांश महिलाओं ने चंदा की बात में सहमति जताई कुछ महिलाएं जो विमला के सत्य से परिचित थी और जानती थी इसमे विमला का दोष नही वो जानबूझकर कुछ नही करती पर वो सब आज चुप थे क्योंकि पिछली कई बैठकों में इन्होंने ही विमला का पक्ष ले के उसे बचाया था  ..पर आज ये भी बहुमत को देखते हुए कुछ ना बोल पाए ..संसद में प्रस्ताव पास हो गया फैसला किया गया कि अब से विमला के लिए नही रुका जाएगा ..और सभी महिलाएं बिना विमला के जंगल चली गयी..विमला आयी देखा चौपाल में कोई नही पर उसे अचरज नही था उसे पता था आज नही तो कल चंदा अपने मनसूबे में कामयाब होकर रहेगी..उसने भी ज़्यादा प्रतिक्रिया न करते हुए घास लेने के लिए घर के ही पास स्थित खेत मे चले गईं.. उसकी एक गाय तो थी कितना खाएगी ,, बस अब रोज ही वो आस पास के पेड़ों, खेतों से थोड़ा बहुत चारा लाने लगी ..अकेलेपन की उसकी आदत ने उसे  स्थिर रखा उसे विचलित नही होने दिया.. और विमला के इसी व्यवहार ने चंदा को ज़्यादा खुश होने नही दिया ..और इस से चंदा के मन मे विमला के लिए और खिज उत्पन्न हो गयी..विमला एक सन्यासी सा उदासीन जीवन जी रही थी..उसे लगता था उसे बस जीवन काटना है और कुछ नही, ये मान सम्मान ,आदर भाव,शाबाशी, प्रोत्साहन ये सब उसके लिए नही बने है ..साल 1962 आया देश की कई सीमाओं पर चीन ने हमला किया ..क्योंकि इस गांव से चीन सीमा ज़्यादा दूर नही थी इसलिए इन सभी सीमावर्ती गाँवों पर भी खतरा मँडरा रहा था ..गाँव के रेडियो दिनरात बजने लगे ..गांवों में कोतेहुल का माहौल था क्योंकि यहाँ के अधिकांश लड़के फ़ौज में थे वो अपने सपूत के जानमाल  लिए पल पल रेडियो सुन रहे थे ..कई रिटायर्ड फौजी जिन्होंने अंग्रेजों की तरफ से कई युद्ध लड़े थे उनकी भी बाहें फड़क रही थी..और आपने किस्सों से उन्होंने गांव के बच्चों  नोजवानों और महिलाओं में एक जोश सा भर दिया था ..गांव के सभी लोग देश के लिए कुछ भी करने की भावनाओं से ओत प्रोत था..चूँकि चीन हमसे उस समय  शक्तिशाली था इसलिए सरकार ने सीमावर्ती गाँव मे आम गांव वासीयों को हथियार चलाने की ट्रेनिंग देने शुरु करने की योजना बनाई जिससे आवश्यक्ता पढ़ने पर गांव वाले स्वयं की रक्षा कर सके नोजवानों को नाम लिख कर भर्ती किया जाने लगा ...इस गाँव मे भी ट्रेनिंग कैम्प बनाया गया और गांव की सभी सक्षम महिलाओं को 3 नॉट3 रायफल चलाने के उद्देश्य से  बड़े से खेत को चुना गया एक किनारे घासफूस का एक आदमी नुमा टारगेट बनाया गया ..गांव की सभी महिलाओं को एकत्रित कर के आर्मी के ट्रेनर ने एक जोशीला भाषण देते हुए देश के प्रति हमेशा तैयार रहने का उद्देश्य समझाते हुए रायफल के बारे में जानकारी दी ..कैसे पकड़े,, कैसे लोड करें और कैसे निशाना साधते हुए फायर करे..महिलाएं उत्साहित थी क्योंकि उनके जीवन मे कुछ नया होने जा रहा था  पहाड़ की इस कमरतोड़ जीवनयापन में इन्हें ये ट्रेनिंग एक हास्य, विस्मय,आराम का एक पल प्रतीत हो रहा था ..सभी महिलाएं रायफल को हाथों में लेने के एहसास से अभिभूत थी ..कुछ महिलाये इस के वजन से खुद को संभाल नही पा रही थी, निशाना तो दूर की बात इसको लोड करने में ही 2 महिलाओं को एक रायफल में आना पढ़ रहा था .पहले दिन की ट्रैनिंग हुई पर आज सिर्फ रायफल को कैसे पकड़े और कैसे लोड करने की ट्रैनिंग दी गयी
सुबह की ट्रेनिंग के बाद शाम को सभी महिलाएं घास लेने हेतू अपने चौपाल पर एकत्रित हुए और आज की ट्रेनिंग पर हास्य विनोद से चर्चा करने लगी ..चंदा को सब दाद दे रहे थे कि उसने अकेले ही रायफल को लोड किया रायफल के वजन से भी इसे खास असर नही हुआ.. चंदा प्रसंशा से फुली नही समा रही थी पर उसे एक बात अखर रही थी कि ये सब देखने को विमला वहां नही थी अगर विमला वहां होती तो उसकी ये खुशि दुगनी हो जाती  और  विमला जो उदासीन हो चुकी थी तो उसने तो ये मान लिया था कि रायफल चलना उस के बस की बात नही इसलिए वो ट्रेनिंग में भी नही गयी ..और चंदा चाह रही थी कि वो भी वहां हो तो उसे नीचा दिखाने का उसे एक मौका मिल जाये ..अब चंदा ने चौपाल में विमला की बात छेड़ दी कि देखो विमला कैसे खुदगर्ज है उसे देश और गांव की चिंता ही नही हम सभी यहां जी जान से घर का काम भी कर रहे हैं और देश के लिए ट्रेनिंग में भी जा रहे हैं और वो महारानी आराम से घर मे मजे ले रही है ..महिलाओं ने भी चंदा की इस बात का समर्थन करते हुए कोसा और सभी घास के लिए चल दिये..शाम को विमला के घर मे पड़ोस की ताई आयी उसने चौपाल में हुई बात का जिक्र विमला से किया..पर विमला विचलित नही हुई न ही उसे इसका प्रभाव पड़ा..पर ताई ने कहा कि बेटा गांव के सभी जा रहे हैं तू ऐसा करेगी तो सब तुझे बुरा कहेंगे कभी कभी लोकाचार के लिए भी कुछ कार्य करने पड़ते हैं..मुझे पता है तुझ से रायफल नही चलेगी पर तु वहां रहेगी तो गांव वालों को लगेगा तू भी उनमें से एक है । अगर तू ऐसे नही जाएगी तो गांव के समाज से पृथक हो जाएगी ..इस बात ने विमला को  सोचने पर विवश कर दिया और उसने ताई से कल ट्रैनिंग में आने की हामी भर दी ..सवेरा हुआ  खेत मे टारगेट लगाया जा चुका था आर्मी का ट्रेनर और 4..5 जवान  वर्दी में खड़े थे ..गांव की महिलाएं भी एक लाइन से खड़ी थी और दूसरे कोने में झिझक के साथ खड़ी थी विमला, ..चंदा आज खुश थी उस के लिए मानो ओलम्पिक का मेडल आज निर्धारित होने वाला था जिसे वो मान चुकी थी कि उसे ही मिलेगा ..चूंकि विमला आज पहली बार आयी थी तो ट्रेनर ने उसे सब से पहले रायफल पकड़ना और लोड करना सिखाया..विमला ने इतनी भारी रायफल को जैसे पकड़ा धड़ाम से रायफल उसे के हाथ से गिर गयी उसे लगा रायफल न हो उसने हाथी को गोद मे उठा लिया हो ..सारी महिलाएं ये देख के हँस रही थी और ट्रेनर भी पर विमला विचलित ना थी न उसमे दबाव था क्योंकि उसके पास खोने के लिए कुछ नही था ..जैसे तैसे उसने रायफल के वजन से अपने को संतुलित किया ..ट्रेनर ने कहा विमला आप तब तक रायफल पकड़ने का अभ्यास करो तब तक  हम अन्य महिलाएं को टारगेट पे फायर करना सिखाते हैं..विमला चुपचाप अभ्यास करने लग गयी ..और अन्य महिलायें बारी बारी से फायर करने लग गयी..कई महिलाएं निशाना तो दूर फायर के आवाज से ही डर के चीखने लगी..किसी का भी निशाना टारगेट के आस पास ना था..चंदा की बारी आई उसने अपने बलिष्ठ शरीर से एक हाथ से रायफल को पकड़ा एक बार मे लोड कर के अभिमान से विमला की तरफ देख कर मुस्कुराते हुए टारगेट पर निशाना सादा पर जैसे ही फायर किया फायर की आवाज और रायफल के धक्के से चंदा संतुलन खो गयी और चंदा का फायर आसमान में जा पहुंचा..उसका भी फायर टारगेट के  आस पास ना था..किसी भी महिला का का फायर टारगेट के दूर दूर तक नही लगा ..ट्रेनर भी हतोत्साहित हो गया और उस ने विमला को कहा आप भी फायर करो बाकी कल देखेंगे  ..उसे भी विमला से उम्मीद न थी न किसी को ,चंदा को तो यह था कि जब वो नही कर पाई विमला तो ट्रिगर दबा भी पाती है कि नही..खैर विमला का टर्न आया विमला फुर्तीली तो नही थी पर उसमे ध्यान केंद्रित करने की एकाग्रता थी और न उसमे कोई दबाव था .. रायफल के वजन को जैसे तैसे संतुलित करते हुए उसने टारगेट पे निशाना सादा ..वैसे ही जैसे वो मायके में अपने पसन्द के फल आम के लिए पत्थर को सादती थी ..ध्यान केंद्रित करते हुए उसने फायर किया..फायर की गर्जना हुई..पेड़ो से पक्षी उड़ गए..और धड़ाम से किसी के गिरने की आवाज आई ..एक तरफ विमला गिरी थी जिसे फायर के बैक प्रेशर ने गिराया था और सामने घासफुश का अदमीनुमा टारगेट..सब हतप्रभ थे ट्रेनर ने अचंभित होकर टारगेट के पास आकर देखा ..गोली सीने के बीचो बीच लगी थी..उसने ताली बजाते हुए हर्ष से नाद किया ..तुमने कर दिया ..शाबाश तुमने कर दिया..किसी को विश्वास नही हुआ सबने सोच तुक्का लग गया ..फिर एक बार टारगेट सेट किया गया विमला ने भूमि से उठ के धोती की धूल को झाड़ते  हुए फिर निशाना सादा और फायर किया इस बार तो गोली सीदा सर के आर पार हुई..करतलध्वनि से वो खेत गूँज उठा ..विमला से ट्रेनर ने 12 फायर करवाये और सभी 12 के 12 टारगेट पे लगे ..शायद वो टारगेट पे नही चंदा के अभिमान पे लगे थे..ट्रेनर और जवानों और गांव के सभी पूर्वफ़ौजियों ने जम कर विमला की तारीफ की ..चारों तरफ शोर था विमला ने कमाल कर दिया ..विमला हमारे गांव की शान है ..ट्रेनर ने विमला का उदाहरण देते हुए अन्य महिलाओं को उस से सीखने की सलाह दी..चंदा का मानमर्दन हो चुका था शाम के समय महिलाओं की चौपाल फिर हुई ,चौपाल में बस विमला पर चर्चा हो रही थी ..और आज की चौपाल में चंदा की अनुपस्थिति ने बता दिया था कि प्रतिस्पर्धा में वो आज हार चुकी है उसे विमला ने नही उसके अहम ने हराया था ..काफी दिनों तक गांव में बस विमला की चर्चा थी..शाम को चाय की दुकान में एकत्रित हुए पुरुषों से लेकर स्कूल गए बच्चों तक विमला विमला नाम छाया हुआ था..आस पड़ोस और विमला के मायके में भी विमला की ख्याति पहुंचने लग गयी..कुछ अफवाह भी उड़ने लगी जैसे नरबक्षी बाघ को मारने के लिए  वन विभाग ने  विमला से मदद मांगी है ..और राष्ट्रीय निशानेबाजी स्पर्धा में विमला का नाम चयन हुआ है इत्यादि. विमाला को एक एक उपाधी दी गयी अब उसे निशानची विमला के नाम से पुकारा जाने लगा,.विमला का पति स्वयं को आज अमीर समझने लग गया था क्योंकि जिधर भी जाओ उसे विमला का पति होने का सम्मान मिलता था ,विमला के नाम से ही अब उसकी और गांव की  पहचान हो गयी थी ..,आज भी विमला विचलित नही थी पर आज उसमे आत्मविश्वास था  और जो जीवन वो काट रही थी अब उसमे वो अपने लिए सम्मान देख रही थी ...उसे लग रहा था की समाज मे उसका भी स्थान है वो भी किसी कार्य मे निपुर्ण है ..हर कोई हर  कार्यक्षेत्र में निपुण नही हो सकता सबकी अपनी विशेषता होती है और सबकी अपनी कार्यक्षमता,..विमला ने सारे पैमाने बदल दिए थे ..1962 के युद्ध मे देश तो हारा मगर इस गांव में कोई जीत गया था . इस युद्ध मे हमने काफी ज़मीन खोई मगर इस सुदूर सीमावर्ती गांव ने पाया एक निशानची.."विमला निशानची"

लेखक- आशीष नौटियाल