Tuesday, 24 July 2018

ओ यारा तू मतलबी

ओ यारा तू मतलबी..ओ यारा तू मतलबी.

फूल सा था  मैं जब रंगीन ..
मेरे रंगों से खेली तूने होली..
रस रस मेरा लुटा तूने .
खाली कर दी मेरी झोली..ओ यारा तू मतलबी

सागर सी तू अब इतराती .
मुझ पोखर को अब तू भुली..
रस गगरी मेरी कर के  खाली..
फोड़ दिया दे ठोकर मारी.. ओ यारा तू मतलबी

आंखों को मेरे सपने दिखा के
भर गयी इनमे  खारा पानी..
दर दर खुद को खोजने निकलूँ.
मेरा पता में ही ना जानू...ओ यारा तू मतलबी

तन में मेरे जगा के सावन..
दे गई फिर पतझड़ सी अगन.
अब किसी ओर है तू बरसती.
जल जल के मैं यहां राख हो रहा..ओ यारा तू मतलबी

दिन के उजाले तूने  छीने..
अंधरे दर्द के मुझे लगे है पीने..
में पतंगा अब मारूंगा जल जल
घाव ये इश्क का न देगा जीने.. ओ यारा तू मतलबी

~~~आशीष नौटियाल~~~

Saturday, 21 July 2018

कोई तो हो

कोई तो हो जो समक्ष आये.
अमिट स्वप्न सी नेत्रों में आये.

टूटे न निंद्रा अब जब में सौऊँ.
स्वप्न बह न जाये अब इतना न रौऊँ.

कविता मेरी अब उसके छंदों में हो.
कृति मेरी अब उसके रंगों में हो.

काव्यों में मेरे वो अलंकार सजाये.
गद्यों में मेरे वो किरदार निभाए.

किनारों में हूँ, फिर भी प्यासा हूँ, में.
बूंद स्नेह की पिला दे,"चातक पक्षी" हूँ मैं.

जीवन में आकर वो शंख नाद कर दे.
"जहान्वी" बनकर मेरे वो संताप मिटा दे.

लगे न जीवन में अकेला हूँ, मैं.
लगे मुझे तेरे तन की परछाई हूँ, मैं.

सुखी धरा में मैंने स्वप्न बीज हैं बोए.
संग में अब हम तेरे हँसे और रोयें.

सपनो को मैंने अबतक अकले है ढोया.
कन्धा दे लगे कुछ है जीवन में पाया.

~~~आशीष नौटियाल~~~

Tuesday, 17 July 2018

मेरी माँ की आंखों में मगर सपने हज़ार थे

ना थी दीवारे जिसके घर की खड़ी..
हर मौसम से वो अपने नंगे बदन लड़ी
फटी जेब में उसके बस रूपये दो चार थे ..
मेरी माँ की आँखों में मगर सपने हजार थे..

रह रह कर भूखा उसने भूख को हरा दिया..
मेरे लिए उसने अपने तन को सूखा दिया..
खाल में बस अब हड्डियों के ही निशान थे.
मेरी माँ की आँखों में मगर सपने हजार थे..

स्वेटर नहीं उसने मेरे कल के सपने बुनेे..
जला के देह अपनी मेरी ख़ुशी के मोती चुने..
त्यौहार सारे हमारे बस नाम के थे..
मेरी माँ की आँखों में मगर सपने हजार थे..

हे ईश कहीं उसके इरादों में.
झलक जाता है वो उसकी कर्मठता मैं..
मेरे लिए वो ही मंदिर और मस्जिद थे..
मेरी माँ की आँखों में मगर सपने हजार थे..

है माँ तेरी उमींदों को न झुकने दूँगी..
हर सपना हो तेरा सच ये प्रण करूंगी..
है तू मेरा ईश और मैं विश्वास तेरा.
लाऊँगी उजाले की अब न होगा अँधेरा..

~~~आशीष नौटियाल~~~

Thursday, 12 July 2018

तुमसे मुलाकात की बेताबी का आलम क्या कहूँ.. मेरे ख्वाब ,मेरी नींद को दे के रिश्वत .. मुझे जल्दी सुलाते हैं ~~~आशीष नौटियाल~~~

तुमसे मुलाकात की बेताबी
का आलम क्या कहूँ..
मेरे ख्वाब ,मेरी नींद को दे के रिश्वत ..
मुझे जल्दी सुलाते हैं
~~~आशीष नौटियाल~~~

Wednesday, 11 July 2018

प्रेम प्रदर्शन

प्रेम प्रदशर्न  मुझको ना आये..
संकोच से मेरे भाव संकुचाये..
नहीं हूँ मयूर जो पंख फैलाऊँ..
नाच नाच मैं तुझे रिझाऊं..

जल में घुला दुग्ध रुपी प्रेम मेरा..
तू बन जा हंस चुन ले प्रेम मेरा..
तेरे प्रेम बिन मैं तो मात्र जल हूँ
मेरी आत्म हो अब तुम मैं तो बस देह हूँ

मैं हूँ सागर मेरे भाव है मोती..
तू बन के चंद्र मुझमें ज्वार क्यों ना लाती..
जो बहार आते मोती तब तुम समझती...
अथाह प्रेम का हूँ कुबेर तुम मान लेती..

मौन हूँ नहीं कह सकता तुमसे प्रेम है कितना..
अतिसयोक्ति होगी यदि कहूँ अनगिनत तारों जितना..
शायद होगा उतना जितना चातक की लालसा में.
दृश्य मात्र को व्याकुल जैसे गोपीयों के विरह में..

~~~©ashish nautiyal~~~

Monday, 9 July 2018

भीगे जो बारिश में सारे रंग उतर गए.. बेरंग फीका सा कागज कोरा सा हूँ.. रंगरेज तू फिर रंग ना दे मुझे. मिट्टी से लिपटकर मिट्टी का हो गया हूँ..

भीगे जो बारिश में सारे रंग उतर गए..
बेरंग फीका सा कागज कोरा सा हूँ..
रंगरेज तू फिर रंग ना दे मुझे.
मिट्टी से लिपटकर मिट्टी का हो गया हूँ..
~~~आशीष नौटियाल~~~

यकीन नही होता

यकीन नही होता यहां किसी को प्यार मिला..
जिसे भी देखा उसे बस इंतजार मिला..
किस मीरा को उसका यहां श्याम मिला..
कहा कभी उसे पागल, कभी  विष का प्याला मिला..

यहां जब भी डालियों में फूल खिला..
उसे बस तोड़ने वाला हाथ मिला..
यहां जब भी बहे प्यार में आँसू..
उन्हें पोछने वाला हाथ ना मिला..

जाने क्यों में इस प्यार की नदी में बह चला..
जनता था यहां कब हीर से राँझा मिला..
वफादारी का मुझे ये इनाम मिला.
खूबसूरत चेहरों से मुझे दगा मिला

ये बातें है ना जाने किस जहां की?
जहां प्यार में दो दिल मिले..
मुझे तो यहां कुछ ना मिला..
तुझे मिल जाए ऐसे तकदीर मिले..

~~~आशीष नौटियाल~~~

मेरे लफ्ज भी शायद नशा करते हैं.. लिखूँ जब भी कागज में ,ये मेरे राज खोल देते हैं.. ~~~आशीष नौटियाल~~~

मेरे लफ्ज भी शायद नशा करते हैं..
लिखूँ जब भी कागज में  ,ये मेरे राज खोल देते हैं..
~~~आशीष नौटियाल~~~

Saturday, 7 July 2018

हमारे दिल के कत्ल के गुनाहगार भी हम ही थे.. जो उनकी मुफ़लसी की जरुरत को इश्क़ समझ बैठे ~~~आशीष नौटियाल~~~

हमारे दिल के कत्ल के गुनाहगार भी हम ही थे..
जो उनकी मुफ़लसी की जरुरत को इश्क़ समझ बैठे
~~~आशीष नौटियाल~~~

Thursday, 5 July 2018

तुझ से दूर

वो जुदाई में तुझ से दूर ,
हर पल तुझे याद करता है..
अपने अल्फ़ाज़ों से कागजों में
तेरी ही बात करता है..
~~~आशीष नौटियाल~~~

Wednesday, 4 July 2018

समर्पण प्रेम

रोम रोम तेरी प्रीत में, मेरा कण कण अर्पण..
तेरा ही प्रतिबिम्ब है मुझ में ,  निहारू जब दर्पण.

चित्त भी तुझमे, मेरा आत्म भी तू..
मैं अब स्वयं नहीं,अब मैं स्वयं भी तू..

रूदन अब कैसा अब कैसा संताप करूँ..
विलय हूँ तुझमे ..अब क्या अवसाद रखूँ..

तनिष्क, रजत, रत्न जड़े सबके आभूषण
किया  श्रृंगार तेरा  , मेरे तुम ही भूषण..

लेश मात्र रही ना आशक्ति अब जग से..
जाना जब मेरा जन्म हुआ तेरे ही निमित्त से..

स्वयं की बन के प्रियसी मैं अब स्वयं से प्रेम रचाऊं..
स्वयं का करूँ आलिंगन, अब स्वयं को लाड लड़ाऊं..

अब अपूर्णता को हर मेरी मुझे संपूर्ण कर दे...
अब तुझ में समर्पण है मेरा मुझे ब्रह्म कर दे...

~~~आशीष~~~

हर पहर पहर है जहर जहर

अवसादों का अब कहर कहर..
हर प्रहर प्रहर है जहर जहर..
स्थूल काया है बोझ बनी..
मन खोजे तुझे डगर डगर..
तुम नहीं अब ..पर तुम ही हो
मेरे ह्रदय सागर की लहर लहर.
हर पहर पहर है जहर जहर..

नहीं सहन प्रज्वल आग ये विरह की..
मत जाओ तुम जरा ठहर ठहर..
वाणी ने है मेरे मौन धरा..
पर नाम तेरा है मेरे अधर अधर..
अवसादों का अब कहर कहर..
हर पहर पहर है जहर जहर.
~~~~©आशीष नौटियाल~~~~

चक्र

ये नदियाँ जो मुझ में आ मिली.
एक तृप्त सिन्धु बन गया मै.
बहे हर्ष से रिमझिम नीर.
नमकीन खारा हो गया मैं..

प्रेम लहर मैंने छलकाए.
एक पागल अनुरागी बन गया मैं.
निकले वो भावों के मोती.
निशब्द कवि बन गया मैं.

उसके रंगों से रंगा मैं ऐसे.
ज्वार उल्लाश का बन गया मैं
उछाला मचला उस चाँद की कलाओं में ऐसे.
एक मदमस्त नृत्यांगना बन गया मैं.

पर पथिक थी वो उड़ गयी बादल बनकर.
मोन दर्शन अभिलाषी बन गया मैं..
वियोग मैं बहे फिर नीर ऐसे.
पुनः: खारा हो गया मैं.

ये चक्र था, ठहराव नहीं.
बस ये समझ न पाया मैं.
फिर वो बरसेगी बूंदों में वो.
पुनः: व्याकुल चातक बन गया मैं.

ढले की नदियों में वो फिर से.
पुनः हर्षित होऊंगा मैं.
फिर पुनः: हर्ष: के नीर बहेंगे .
खारा था पुनः: खारा हो जाऊँगा मैं...
..ashish

ना तेरी फिक्र होगी अब न तेरा जिक्र होगा

ना तेरी फ़िक्र होगी , ना ज़िंदगी में तेरा अब जिक्र होगा।।
रह रह के बैचैन किया जिसने मुझे..
तेरी यादों का न अब वो तिलस्म होगा..

बेरुखी ने तेरी कर दिया इस दिल को बंजर..
रुला के सूखा डाले मेरे आँखों के समंदर..
अब ना मुझे तेरे इश्क़ का इन्तजार होगा..
ना तेरी फ़िक्र होगी , ना ज़िंदगी में तेरा अब जिक्र होगा।।

लगता मेरे इश्क ने तुझे घुटन दी है.
तुझे भाता सारा आकाश मैंने तेरी उड़ान बाँधी है..
उड़ लो बेहिसाब अब ना लौट आने को तेरा इन्तजार होगा..
ना तेरी फ़िक्र होगी , ना ज़िंदगी में तेरा अब जिक्र होगा।।

शायद रेत में अपने इश्क़ का कलमा लिख रहे थे हम..
पत्थरों पे भी होगा दिल इसका था शायद हमे भ्रम..
होंगे कई तेरी चौखट पे खड़े पर अब मेरा दिल न होगा..
ना तेरी फ़िक्र होगी , ना ज़िंदगी में तेरा अब जिक्र होगा।।

~~~©आशीष नौटियाल~~~

~~~

मैं रूठा मैं खुद रोया और खुद ही मान गया..
कम्बख्त माँ के बाद मुझे कोई मानाने वाला ना मिला..
~~~आशीष नौटियाल~~~

निशानियाँ

आओ इन लम्हो की कुछ निशानियाँ रखते हैं..
जिंदगी की गुलक में यादों की चवन्नियां रखते हैं..

भरते हैं इसे अपने खुशनुमा पलों से..
हिलाओ जब तो इसमें हमारे लम्हें खनकते हैं
जिंदगी की गुलक में यादों की चवन्नियां रखते हैं..

हुए कभी दूर ,,या ज़िन्दगी ने रुला दिया..
फोड़ंगे तब इसे ..की सहेजी यादें फिर हंस पड़े..
आओ इन लम्हो की कुछ निशानियाँ रखते हैं..
जिंदगी की गुलक में यादों की चवन्नियां रखते हैं..

~~~©आशीष नौटियाल~~~

शायरी

हो इश्क़ हमे भी ये हम भी चाहते हैं ऐ खुदा..
पर तेरे बनाये बुतों में अब दिल कहाँ मिलता है..
~~~आशीष नौटियाल~~~

ना निशब्द रहो

अब न तुम निशब्द रहो.
मुस्काते व्यंगों को अब न सहो.

नदी हो तुम "अविरल" बहो.
बांधों के बंध अब न सहो.

मेघों की तरंह तुम गरजते हो आये.
सिंह पे कैसे ये चूहे चिल्लाये.

अब गरजो ऐसे की सिंह भी थर्राए.
बरसो ऐसे की वशुंधरा तृप्त हो जाए.

चुन ले कोई वो "मोती" न बनो.
छु भी न पाए कोई धधगता वो "सूर्य" बनो.

बांध लो जटाओं में तुम निराशा के प्रवाह को.
गले में धारण कर लो अभाग्य के गरल को.

कुंद तलवारों से तू युद्घ जीता दे.
बिन वज्र तू नभ को चम्म्कादे.

बहुत हुई वो शमशानी रातें.
स्वप्न की वो कुंठित यादें.

उठो अब समग्र बनो.
बिन पंखों के अनंत उड़ो.

हवाओं का तुम वेग न देखो.
अनंत उड़ोगे अपने विश्वाश को देखो.

मिलेगी मंजिल ये विश्वाश है मेरा.
कर्म कर ऐसा की टूटे न विश्वाश मेरा..

~~~आशीष नौटियाल~~~

वो अंतिम बसंत

~~~वो अंतिम बसंत~~~

इस पतझड़ में उस पेड़ के जो पत्ते झड़े..
फिर ना आने को उस से वो जैसे अड़े..
उसकी जर जर साखों में ,
कान्तिहीन काया में,
अब वो कैसे रहें..
अपना हरित श्रृंगार अब उसे कैसे दें..

अब रहा ही क्या था  इसमे ,,
अब तो ये पेड़ नही बस काठ है..
सभी तो छोड़ चुके हैं इसको..
अब ना फल ना फूल ,
ना गिलहरियाँ , ना पक्षी,
ना ही उनके घोंसले हैं..

अब इसमे ना इसमे शक्ति,
ना ही पोषण करने की क्षमता..
दीमकों का आश्रय बन गया है ये..
तनों में इसकी अब खिलता कुकुरमुत्ता..

पर पेड़ था अनजान ,
उसे तो बस बसंत का इंतजार था..
जैसे बच्चे लालायित होते,
नए कपड़े पहनने के लिए..
नई कक्षा की नई किताबों को देखने,
उनमें अपना नाम लिखने के लिए..

पेड़ भी वैसे लालायित था,
नए पत्तो, खुबसूरत फ़ूलों,
मीठे फलों ,से अपना श्रृंगार करने को
और नए पक्षियों , गिलहरियाँ,
के घोसलों को आश्रय देने को..

लो आया बसन्त ,
हर पेड़ों में बहार आयी..
ऋतुराज ने मानों सौन्दर्य की बर्षा की..
हर पेड़ था झूम रहा नए नए हरे पत्तों से.
बसने को इन पेड़ों में,
नए पक्षियों की कई टोलियाँ आयी..

वन गुंजायमान था पक्षियों के
कोलाहल में ,,
जैसे किलकारियां हो
नवजात के घर आने में..

पर इस सूखे पेड़ में अभी भी
सन्नाटा पसरा था,,
वो एक नग्न काया जैसे
अब असहज महसूस कर रहा था
ईष्या, विस्मय, डर के मिश्रित भावो से
वो सब पेड़ों के बीच रह रहा था..

उसे याद आया बगल में
कभी खड़े हुए उस सेहतुत के पेड़ की..
जब ये छोटा था तो उसकी ऊंचाइयों को
आदर्श मानता था, उसके जैसा बनना चाहता था..
उसमे भी तो एक बार पत्ते नही आये थे?
और फिर वो कुछ वर्षों में मरुवृक्ष होकर
वो धड़ाम से एकायक गिर गया था..

क्या मेरे साथ भी ऐसा होगा?
क्या इसबार मुझपे भी इसलिए पत्ते नही आये..
क्या इसलिए पक्षी घोसले बनाने नही आये..
क्या मैं भी मरुवृक्ष होकर गिर जाऊंगा?
क्या सभी का ये ही हाल होता है?
में तो समझता था मैं ऐसा ही रहूँगा..

पेड़ अपने ही सवालों का उत्तर ढूंढ चुका था..
फिर भी सच को नकारते हुए..
उम्मीद से पतों का इंतजार कर रहा था..
बसंत गया , ग्रीष्म आया,
अब वो धूप में नग्न काया लिए झुलस रहा था..

अब उसे अपना डर सच्चा लगने लगा..
ये संसार उसे अब स्वार्थी लगने लगा..
पत्ते स्वार्थी,, फूल स्वार्थी,, फल ये पक्षी स्वार्थी..
ये संसार है बस माया यहां कोई ना अविनासी..
अब उसे भी संत जैसा वैराग्य उत्पन्न हो गया..
छोड़ दिया उसने भी अन्न जल ,,
और खुद को प्रकृति के साथ सूखाने लगा..

ऋतु सावन की बरस के आयी,,
प्यासे पेड़ों को तृप्त करने लगी..
पर इस पेड़ में कोई प्यास ना थी..
उसे सत्य का ज्ञान था,,वो पहले ही तृप्त था..

एक सवेरा उसने देखा
एक कोमल लता उसपे चढ़ रही है..
जैसे बेनामी भूमि पे कोई कब्जा करे..
उस लता ने उस पेड़ के,
आधे हिस्से को अपने अधीन किया..
अपनी हरियाली से उसने
उस पेड़ का हरित श्रृंगार किया..

ये सुखा पेड़ भी
कुछ कुछ हरा सा लगने लगा..
पर वो फिर भी हर्षित न हुआ..
वो अब ज्ञानी जो था ..
जानता था ये अप्राकृतिक स्वार्थी श्रृंगार है.
ये भी एक क्षणिक भ्रम है , माया है..

वैसे भी बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम .
बस उसे ये श्रृंगार उसे ऐसे लगा..
फिर भी उस ने उस लता को आश्रय दिया..
निश्वार्थ भाव भी तो वैराग्य से उत्पन्न हो गया..
फिर एक रोज जाड़े की रात में ..
अपने शरीर मे दीमकों के दिये जख्मों.
उस ठंडी हवा के थपेड़ों ..
और निढाल शरीर के बोझ से
उसने अपना सामर्थ्य खो दिया..
उस सेहतुत के पेड़ की तरह
ये भी इस भूमि में गर्जना से गिरा...

~~~©आशीष नौटियाल~~~

शायरी

उनसे अलविदा कहना यूँ आसान तो ना था..
पर मेरे राख दिल को फिर जलना मंजूर ना था..

~~~आशीष नौटियाल~~~

उनसे इश्क होना ही था

वो चिराग से रोशन..
हम पतंगों में एक पतंगा..
राख तो हमे फिर होना ही था..
उनसे इश्क़ होना ही था..

वो घुमड़ते बदलों का झुंड..
हम ज़मीन का सुखा ज़रा..
गिला तो  हमे होना ही था..
उनसे इश्क होना ही था..

वो आयतों में ढली एक किताब..
हम नमाजी शहरों के काफ़िर..
सजदे में फिर झुखना ही था
उनसे इश्क होना ही था..

~~~आशीष नौटियाल ~~~

खामोश अल्फाज

हम तो कब से खामोश हो गए थे , जब तुम चले गए..
ये तो अल्फ़ाज़ों का शोर है जो तुम तक पहुंचता है..
~~~आशीष नौटियाल~~~

आज उनसे जो मिल लिए

आज उनसे जो मिल लिए..
लगा मरे थे फिर जी लिए..
आँखों ने ही बात की बेइंतहा उनसे
ये होंठ मानो किसी ने सील दिए..
जमी धूल आंखों की फना हो गयी.
सामने जैसे कई सुरज चमक गए..
बोले हम क्या ,, क्या उसने सुना..
बस हम यादों में एक याद और जोड़ गए

~~~आशीष नौटियाल~~~

उनकी झलक

यादों ने जख्मों को कुरेद के  देखा..
नज़रों ने भीगी पलकों की ओट से देखा..
बेबस लाचार होकर शब्द चुप से हो गए..
हाँ !उन्हें सालों बाद हमने अपने शहर में देखा..
~~~आशीष नौटियाल~~~

बसंत और तुम

बसंत और तुम आते तो हो पर पतझड़ के बाद..
नए फूल, नए पत्ते, नए तुम्हारे वादे , नए इरादे..
नवीन का मतलब पुराने को भूला देना तो नही?
पतझड़ में पुराने सारे किये वादे भूल चुके हो..
निभाते कुछ नही पर बसंत लाने का दावा करते हो..
बसंत और तुम आते तो हो पर पतझड़ के बाद.

~~~ashish nautiyal~~~

शाश्वत प्रेम

ना वेदों के आख्यानों में.
ना मंत्रों के ब्याख्यानो मैं.
नहीं प्रेम  को पारिभाषित मैंने किया.
मैंने शाश्वत प्रेम किया.

बोली भावों की अनसुलझी भाषा.
रही ह्रदय में बस उसकी  अभिलाषा.
उसको कहानी से काव्य किया.
मैंने शाश्वत प्रेम किया.

"मीरा" के उस कृष्ण को पाया.
"रूमी" के उस अल्हा को पाया.
परम ब्रहम को निकट किया.
मैंने शाश्वत प्रेम किया.

बना "रात्रिचर" ना जाने कैसे.
रूठी निंद्रा न जाने कैसे.
नैनो में उसको "स्वप्न" किया.
मैंने शाश्वत प्रेम किया.

मौन भावः उसने जगाये.
आँखों के आंशु छलकाए.
अंतःकरण मैंने शुद्ध किया.
मैंने शाश्वत प्रेम किया.

मदिरा के उस घूंट को पिया.
अमृत कि उस बूंद को पिया.
उसको जीवन का हर स्वाद किया.
मैंने शाश्वत प्रेम किया.

वो नहीं तो फिर भी वो प्रेम रहेगा.
माली न रहे फिर भी ये पुष्प खिलेगा.
उस प्रेम मैं मैंने "समर्पण" किया.
मैंने शाश्वत प्रेम किया.

उसका ही अब "वरण" करूंगा.
उसमे ही अब "विरल" बहूँगा.

उस प्रेम के साथ मैं करुँ अब विचरण.
मिले जीवन मैं उससे ही त्वरण.
By Ashish Nautiyal

Tuesday, 3 July 2018

राधा का जन्मदिवस

जन्म दिवस में राधा के कृष्ण ढूंढे उपहार..
ढूंढे से मिला नहीं .. छोटा पड़ा संसार..

रत्नाकर के रत्न के अब ना रहे मोल ..
राधा के सम्मुख फीके सारे वो अनमोल।

थक हार के राधा से कृष्ण खुद ही बोले..
तुम्ही बताओ अब दूं क्या तुम्हे..
जो तुम्हारे रूप को तोले ।।

हंसी राधा गरज से .कृष्ण को लगा दिया गले..
त्रिभुवन हो जिसकी बाँहों में उसे अब क्यों उपहार मिले।
..............आशीष नौटियाल...................

ना खिलाओ नवजात पुष्पों को

हे बसंत ना खिलाओ.
अब इन नवजात पुष्पों को..
ये देश अब गिद्दों का हो चला है.
नोंच दिए जाते हैं..
लूट लिए जाते हैं..
मासूमियत का यहां
इंसानियत गला घोटती है..
इनकी लांशों में है अब शतरंज की बिसाते..
जो चले ढंग से वो ही सत्ता पे नाचे..
पुष्पों का भी अब धर्म हो चला हैं..
नेता ने हर माली को यहाँ ऐसे ही छला है..
है बसंत ना ख़िलाओ
अब इन नवजात पुष्पों को
~~~आशीष नौटियाल~~~

विरह

विस्मृत कर के उसकी स्मृतियाँ...
नैनों से मिटा के उसकी आकृतियाँ..
मुझे उसे से तू  अब विरक्त कर...
इस विरह का अब तू अंत कर..

प्रेम नहीं ये थी मरीचिका ..
विरह में मुझे तड़पाने की उसकी कृतिका..
बुझा प्यास मेरी या मुझे अब संत कर..
इस विरह का अब तू अंत कर..

हे समय चक्र तू थोड़ा तेज़ चल..
सुखा दे मेरे नीर प्रपातों का जल..
इन खाली पहरों को तू अब अल्प कर..
इस विरह का अब तू अंत कर..

पथिक हूँ पर रुक सा गया हूँ...
दोड़ रहा है जग मैं  थम सा गया हूँ ..
दे मुझे मंजिल और मेरा विस्तार कर..
इस विरह का अब तू अंत कर..

~~आशीष नौटियाल~~

नजर

झुकी सी नज़र में कैसे तेरी आँखों का दीदार होगा..
महोब्बत में आंखों की मुलाकात जरूरी है जालिम..
कब तक मेरी आँखों को यूँही एकतरफा प्यार होगा..
~~~आशीष नौटियाल~~~