रोम रोम तेरी प्रीत में, मेरा कण कण अर्पण..
तेरा ही प्रतिबिम्ब है मुझ में , निहारू जब दर्पण.
चित्त भी तुझमे, मेरा आत्म भी तू..
मैं अब स्वयं नहीं,अब मैं स्वयं भी तू..
रूदन अब कैसा अब कैसा संताप करूँ..
विलय हूँ तुझमे ..अब क्या अवसाद रखूँ..
तनिष्क, रजत, रत्न जड़े सबके आभूषण
किया श्रृंगार तेरा , मेरे तुम ही भूषण..
लेश मात्र रही ना आशक्ति अब जग से..
जाना जब मेरा जन्म हुआ तेरे ही निमित्त से..
स्वयं की बन के प्रियसी मैं अब स्वयं से प्रेम रचाऊं..
स्वयं का करूँ आलिंगन, अब स्वयं को लाड लड़ाऊं..
अब अपूर्णता को हर मेरी मुझे संपूर्ण कर दे...
अब तुझ में समर्पण है मेरा मुझे ब्रह्म कर दे...
~~~आशीष~~~
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