वो चिराग से रोशन..
हम पतंगों में एक पतंगा..
राख तो हमे फिर होना ही था..
उनसे इश्क़ होना ही था..
वो घुमड़ते बदलों का झुंड..
हम ज़मीन का सुखा ज़रा..
गिला तो हमे होना ही था..
उनसे इश्क होना ही था..
वो आयतों में ढली एक किताब..
हम नमाजी शहरों के काफ़िर..
सजदे में फिर झुखना ही था
उनसे इश्क होना ही था..
~~~आशीष नौटियाल ~~~
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