कैसे देवभूमि है अपनी
जो तेरे बंजर मकान में भी
फूल खिला रही..
और एक तू है .
परदेश चला गया है
खुद को खिलाने के लिए..
कन देवभूमि ची अपरि
जु तेरा बाँझा कुड़ा मा भी
फूल ची खिलाणी..
यो तू ची
बिरणा मुल्क जयूँ ची..
खुद खिलणों तें..
~~~आशीष नौटियाल~~
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