Thursday, 27 September 2018

दढ़ियल

उस को भाता दढ़ियल सइयाँ..
अपना सफाचट मैदान है..
हमने सोचा हम भी उगा दे
खेत तो ये सारा अपना है..
श्याम वर्ण हूँ भूल गए हम .
खेत भी अपना काला है..
काले चाँद पे श्रृंगार काजल का
रूप अब अपना निराला है..
भागे डर के यक्ष किन्नर गंधर्व सब
अब काल भैंस पे सवार है.
वो स्वेत वर्ण खड़ी थी सम्मुख.
प्रेम का आज इम्तिहान है.
देख के वो हो गयी मूर्च्छित,
स्वेत वर्ण उसका अब नीला है.
इश्क हमारा उड़ गया  भाप सा.
फिर खाली अपनी गागर है.
हुए सफ़ाचट फसल काट के.
काला चाँद अब चम्मकता तो है
~~~आशीष नौटियाल~~~

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