पल जिसमे हम थे, में उसे जी चुका था , उसका नशा मुझसे उतर चुका था , में उसे छोड़ आगे बढ़ना चाहने लगा शायद जैसे प्यास के बुझ जाने में पानी का महत्व उतना नही रहता जितना प्यास से पहले होता है वैसे ही मुझे उस पल के प्रति आसक्ति ना रही..ना अनुराग, वो पल चुप था, मगर उसकी चुप्पी मानो मुझ से कुछ कह रही थी की फिर जी ले मुझे,शायद बाद में मैं यहां ठहरूं नही , पर में तृप्त था ,सम्पूर्ण था ,अब मानो मुझे वो पल माया, भ्रम, मिथ्या लगने लगा ,मुझ में उसके प्रति वैराग्य उत्पन्न हुआ और उसके प्रति एक उदासीन भाव ले कर में समय के साथ उड़ चला .
गुजरे समय ने पीछे छुटे पलों का एक टीला सा बना दिया ,परत के ऊपर एक परत चढ़ती चली गयी , फिर किसी रोज जब समय के साथ मे दौड़ते दौड़ते जब मैं थक गया , समय की गति से मेरे कदम कुछ पीछे रहने लगे..में हाँफने लगा .. थक के चूर मैने समय को जाने दिया,में रुकना चाहता था थोड़ा आराम करना चाहता था तभी मुझे अपने पीछे अपने जीये पलों का टीला नजर आया में समय से पीछे दो कदम चल कर उस टीले पर चढ़ के बैठ गया ,कुछ देर में यादों की ठंडी हवा चलने लगी ,मुझे राहत महसूस हुई मेरा पसीना सूखने लगा ,मैने महसूस किया हवा में जानी पहचानी सी महक आ रही थी , मेरा मन उस महक से जुड़े पल को उकेरने लगा परत दर परत उखाड़ के में उसे ढूढ़ने लगा , यादों की हवा और तेज़ हुई और साथ मे वो महक भी उन चक्रवर्ती हवा ने टीले की परतों को उखाड़ के अलग कर दिया और वो महक तेज़ होकर मेरी स्मृतियों को अपना परिचय देने लगी , मुझे याद आया ये महक उस ही पल की है जिसे में छोड आया था ,जो मेरा वैराग्य था वो शमशानी वैराग्य लगने लगा, फिर व्यास लगने लगी, आशक्ति बढ़ने लगी..में उस पल के लिए फिर अनुरागी हो गया ,में तड़पने लगा , उस पल को उस टीले में खोजने लगा , काफी परतों के बाद वो धूल मिट्टी से सना पल मुझे दिखाई दिया में लपक के उसे पकड़ना चाहा पर वो रेत हो चुका था जैसे ही पकड़ूँ फिसलने लगा .. वो अब मृत था उसके बस अवशेष ही मेरे हाथों में थे ,में कैसे फिर जीता इसे,, रेत से कैसे प्यास बुझती , पल-पल वो पल याद आने लगा , जितना आये उतना सताने लगा , भ्रम अब सच्चा लगने लगा , पछताऊं, रोयूँ, मनाऊं खुद को..जोगी अब रोगी हो गया..जो पल था वो हमेशा के लिए कहीं खो गया
~~आशीष नौटियाल~~
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