Monday, 1 October 2018

क्या दूँ

रिक्त हूँ कुछ दे नही सकता..


पर कुछ गुनगुनी धूप 


बचायी है मैंने जाड़ों की,


 तेरी नम आंखों को सुखाने के लिए..


कुछ लड़कपन की शैतानियाँ ,


कुछ खेल,  कुछ खिलौने संजोए है मैंने,


तेरे होंठों पे हँसी खिलाने के लिए..


रास्तों से कुछ पगडंडियाँ ,


  कुछ कदम छिपा रखे हैं..मैंने,


तेरे संग संग राहों में चलने के लिऐ.


महफिलों से नज्म, शायरों से शायरी


कुछ कतरने कागज की ,और कुछ श्याही


इकट्ठा की है मैंने,


 तेरे रूप को गढ़ने के लिए..


मीरा का समर्पण, गोपियों का विरह.


सबरी के राम, राधा का कृष्ण


हर भाव से खुद को भरा है मैने


तुझ से प्रेम करने के लिए..


~~~आशीष नौटियाल~~~





 


No comments:

Post a Comment