Monday, 17 December 2018

विरह

श्याह रात,
बुझे चिराग,
लापता चाँद..
गुमराह तारे..
अँधेरा पुनः जीवित  हो चला..

जगे दर्द
घाव हरे 
रूठी नींद
आँसू बहे
 विरह का जहर चढ़ चला.

~~~आशीष नौटियाल~~~

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