Saturday, 15 September 2018

बाजार में थे ...

बाजार में थे कभी जो रुपए के तरंह..

सिक्के वो अब सारे आने हो गए..


गांव का पीपल अब अकेला रहता है.

चौपालें वो सभी मयखाने हो गए..


कौड़ियों में यहां इंसानियत है बिकती.

कौन कहता है बाजार सारे महँगे हो गए?


सीता की तरह दफन है सभी सच्चे

झूठे अब सारे  यहाँ श्रीराम हो गए..


चीर हर के दुर्योधन बना है मंत्री.

लाज रखने वाले कृष्ण बदनाम हो गए..


तुझ पे पैसा तो तू ही अब खुदा..

मठ, मंदिर, आश्रम सारे बाजार हो गए..


कमाता है तु , तो तेरे हैं  सब अपने .

रिश्ते सभी अब व्यापार हो गए..


बरस के जो बुझाए व्यास धरती की..

अब वो बादल सारे आवारा हो गए..


मंडी में चापलूसों की है ऊंची कीमत..

ईमानदार यहां सभी सड़े आम हो गए..


चल जी लेते हैं यहां गूंगा अंधा बन के..

कोई कह न दे तू और मैं पागल हो गए..


~~~आशीष नौटियाल~~~




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