Saturday, 8 September 2018

आज और कल

वो ऑफिस से घर की ओर निकला ही था की बारिश की बूंदों ने उसे भीगाना सुरु कर दिया ,अपने को बचाते हुए उसे ने एक बंद दूकान के छज्जे के नीचे शरण ले ली और सोचने लगा दिन भर तो बारिश का पता नहीं था जैसे ही मेरा घर जाने का समय हुआ वैसे ही मुझे भीगाने आ गयी ना जाने क्या दुश्मनी है कल तक छाता लाता था तो ये आई नहीं आज नहीं लाया तो सरपट आगयी ,,और इन्द्रदेव को कोसते हुए वो भीगती सड़क और पानी उछालती गाड़ियों को देखने लगा वो चुप था मगर उसके ख्याल उसे से बातें करने लगे की आज गाडी पास होती तो बिना भीगे घर पहुँच जाता  यार कार ले तो सकता हूँ 3 लाख की आ जायेगी किस्तों में भी ले सकता हूँ ,फिर ख्याल आया की सपना तो मेरा नौकरी लगने के बाद एक बुलेट लेने का था, उसमे  क्या रौब जमता है फट फट की आवाज में हॉर्न मारने की भी जरूरत नहीं और कॉलेज के दिनों से ये ही तो सपना पाला था ..साला 3 साल हो गए नौकरी लगे अभी तक तो में ले सकता था और एक लदाख का ट्रिप भी कर चूका होता ..तभी टयूशन से घर जा रहे बच्चों पर उसकी निगाह पड़ी वो बच्चे बिना किसी फिक्र के मस्ती में.. झूम झूम के, पानी उछालते हुए, बारिश में भीग के घर जा रहे थे उन्हें देख, उसने सोचा यार ये ही बचपन के दिन अच्छे थे काश मैं भी अभी इनके जैसे होता तो भीग के मस्ती करते हुए जाता ..ऐसे ही निहारते निहारते बारिश रुक गयी और वो भी अपने घर की ओर निकल पड़ा ..पर वो पल उसी छज्जे के नीचे सोचने लगा की ये कभी तो  भीगना नहीं चाहता गाडी की ख्वाइश कर रहा है और एक पल में बच्चों जैसे भीगना चाहता है ,  और वो दोनों कर सकता है पर इनसब को करने से उसे कौन रोक रहा है ? कार भी वो ला सकताहै और बच्चों जैसे भीगने के लिए बचपन में जाने की जरूरत नहीं वो आज भी भीग सकता था ,पहले उसे ही तय करना है वो भीगना चाहता है की नहीं ...असल में उसे आज जीना नहीं आता वो कल के लिए जी रहा था,, वो अपने लिए बच्चों जैसे भीग के जाना चाहता था और समाज के लिए वो बिना भीगे एक कार में ..और वो अपने आप से  और सामाजिक status दोनों के द्वंद में अपना आज खो रहा है ..और कल का कोई भरोसा नही होता।

~~आशीष नौटियाल~~ 

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