काश ये शहर माँ तेरे जैसे होता..
ख़ौफ़ से भरी इसकी फिजाओं मैं..
ख़ौफ़ज़दा सा मैं डर डर के जी रहा
भंवर सी इसकी ये अनगिनत सड़के
जहाँ मैं अपनी जवानी खो रहा..
दिल में भरे हैं इसके स्वार्थ बेरुखी के दलदल.
रात और दिन यहाँ बस रुपयों की हलचल..
काश ये शहर माँ तेरे जैसे होता..
नाम नहीं मुझे गोलू बुलाता..
उठता मुझे गोद में..मुझे पुचकारता..
मेरे डर को दूर कर के ..
स्नैह की एक ओट देता.
भटकता मैं तो डांटता..मारता ..समझाता..
पर मुझे राहों से भटकने न देता
काश ये शहर माँ तेरे जैसे होता..
~~~ashish nautiyal~~~
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