Thursday, 23 August 2018

फूल का प्यार

कहीं किसी डाली में एक गुलाब खिला....
खुसबू से उसकी सारा बाग बान महका...

अभी अभी जवाँ हुआ था वो....
इस दुनिया के चेहरों से अनजान था वो...

सपना था उसका की तोड़े जो हाथ उसको..
हो वो किसी स्वर्ग से उतरी अप्सरा का..
किसी कोमल ह्रदय का ..किसी मदभरी आँखों का..

हो वो परी जो मुझे अपने में खिलाना चाहे...
मेरी खुसबू से महकना चाहे...
मुझे ह्रदय से लगाना चाहे...

सजाये कभी वो मुझे अपने बालों में..
महकाये कभी वो मुझे अपनी किताबों में..

आया वो दिन उसे तोड़ने एक अप्सरा क हाथ आये...
सपना सच होते देख उसके होंठ मुस्कुराये...

डाली छोड़ चला गया वो अपने सपने जीने..
कभी उसे के हाथों में खिलने ...
कभी उसे के बालों में सजने...

मिलन की ख़ुशी में ऐसा महका वो...
उस के तन को उपवन बना गया वो...

लुटा दिया सब कुछ उसने अपने प्यार में...
दे दी उस ने सारी खुसबू उसको..
दे दी  अपनी सारी जवानी उसको...

लुटा के सब कुछ उस पे कुछ बचा नहीं..
ना थी उसमे वो महकती खुसबू...
ना थी उसमे वो आँखों को चुराती सुन्दरता..

अब उस अप्सरा को ये नहीं भाता था...
अब ना ये उसे महका पाता था..
ना अपनी सुन्दरता से उसे लुभा पाता था..

बालों में सजे इस गुलाब को अब फेंक दिया गया..
फिर बागों से जवाँ एक गुलाब लाया गया...
उसकी जगह उसे बालों में सजाया गया...

गुलाब था खामोश मगर वो समझ  चूका था..
इस दुनिया के चेहरों को वो पहचान चूका था..

ये दुनिया बस किसी की खुशबू से महकना चाहती है..
ये मतलबी है बस लेना जानती है..

प्यार में जिसने अपना सब कुछ लुटा दिया..
सुना है वो अगले दिन सड़कों में कुचला मिला..

फिर भी होंठों में हंसी थी उसके ..
की उसने सच्चा प्यार किया..
थोड़ा ही सही वो अपने प्यार को महका गया..

--------आशीष नौटियाल---------

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