Sunday, 12 August 2018

माँ एक गोली मुझे लग गयी..

माँ जो बादल सीमा पार से आये.
संग में गोलियों की बरसात जो लाये.
एक बूंद मुझे भी भिगो गयी.
माँ मुझे एक गोली लग गयी.

देश की लौ बुझाने ये वर्षा थी आई.
माँ फिर भी लौ बुझ ना पाई.
एक- एक बूंद खून की मेरी लौ जलाती रही.
माँ मुझे एक गोली लग गयी.

भीगने का डर अब मुझे नहीं था.
उदित हो सूरज ये अब मन में था.
मेरी गोलियां बादलों को छेदती रही.
माँ मुझे एक गोली लग गयी.

प्रवाह तेरे दूध का मेरी धमनियों में था.
कुछ कर गुजरने का जज्बा मेरी आँखों में था.
ऐसा लाया तूफान जो बादलों को उड़ा ले गयी.
माँ मुझे एक गोली लग गयी.

अँधेरे को दूर भगा दिया मैंने.
सूरज की तपन महसूस की मैंने.
माँ अब साँसे मेरी उखड़ने लग गयी.
माँ मुझे एक गोली लग गयी.

माँ अब नींद सताने लगी थी.
ऑंखें तेरी गोद तलाशने लगी थी.
प्राण गए पर तुझे देखने ऑंखें खुली रही.
माँ मुझे एक गोली लग गयी.

"जो थे माँ तेरे कंधे वो चार कन्धों में आयेंगे.
मुझ मालुम है तेरे आँशु अब न थमने पाएंगे."

"दुनिया में आते देखा तुने मुझे,
अब दुनिया से जाते देखना होगा.
मुझे जो गोली लगी माँ.
उससे सवाल पूछना होगा."

"कितना रक्त पीयेगी तू.
कितनी गोद करेगी सुनी.
दोनों पार बेटे मरते हैं.
माँओं की गोद होती सुनी."

~~~आशीष नौटियाल~~~

No comments:

Post a Comment