सिंधु रो रहा . धरा का हर बिंदु रो रहा.. धूमिल है सूर्य आज. चन्द्र ओज ढूंढ रहा.. भारती विलाप से है छाती पिटती. उसका "अटल" आज अंनत जा रहा ~~~आशीष नौटियाल~~~
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