-आड़ू के फूल-
मार्च का महीना, फरवरी की बची हुई ठंड को सुबह और शाम के पहरो में समेटते हुए शुरू हुआ,मौसम गुनगुना हो रहा था पर हवा में अभी भी ठंडक थी , मार्च ठंड को अलविदा और गर्मी के आगमन की तैयारी कर रहा था .बसंत का शुभारंभ हो रहा था नए फूल, नए पत्ते, पेड़ -पौधे भी सजने को बड़े लालायित होकर झूम रहे थे ..पर बसंत हर किसी के लिए उल्लास का नही होता जैसे विद्यार्थियों के लिए ,,क्योंकि परीक्षा(exam) का आगमन भी इसी समय होता है.तो ये उल्लास विद्यार्थियों के चहरे पर आते आते चिंता और डर का रूप ले लेता है.ये समझलो ये बसन्त का एक प्रकार से side effect है .और ये ही भय और चिंता के भाव कुशाल के चेहरे पर भी हैं ,जिसके स्नातक (graduation) के exam बस होली के तुरंत बाद शुरू होने को थे। पर आज उसके चेहरे में डर से ज़्यादा उत्सुकता व हर्ष की लालिमा छा रखी थी हो भी क्यों नही? गांव से पिताजी की चिट्ठी जो आ रखी है ,क्योंकि ये 1990 का जमाना है मोबाइल आये नही थे ,टेलीफोन सरकारी दफ्तर और कुछ सेठों के घर तक सीमित थे इसलिए चिठियों का दौर था और घर की चिठ्ठी आने का भाव शायद उस दौर का इंसान ही समझ सकता है इसलिए कुशाल आज भावुक था चिट्ठी को दस बार सूंघते हुए , अपने गांव की महक को लेते हुए उसने पत्र खोला और पढ़ा जिसमे पिताजी ने अपनी कुशलता लिखते हुए उसकी कुशलता हेतु भगवान से आग्रह लिखा था साथ मे exam में खूब मेहनत करने को लिखा था , गाँव के समाचार में लिखा था कि गांव में सड़क बनने का कार्य 80 % पूरा हो गया है और शायद मई में पूरी बन के तैयार हो जाये ,कुछ खेत अपने भी आये है जिसके अच्छे पैसे सरकार ने दिए हैं जिस से घर मे लैट्रीन(toilet) बाथरूम बनाने का विचार है, आगे गर्मियां की छुट्टियों में उसका इंतजार रहेगा , ,कुशाल ने न जाने कितनी बार चिट्ठी को पढ़ा, रोया भी ,गांव को याद भी किया , और फिर कैलेंडर को देखते हुए मई का महीना निकाला और थोड़ा देखा ,तारीखे गिनी और फिर पुनः कैलेंडर को मार्च मे कर दिया ,कुशाल जिसे घर मे प्यार या गुस्से दोनों से कुशी नाम से पुकारा जाता था, एक मध्यम वर्गीय परिवार से आता है पिता गांव में खेती करते हैं और साथ मे दूध भी बेचते थे , देखा जाए तो खेती तो बस पेट भरने लायक थी असल आजीविका का स्रोत उनका दूध बेचना ही था .परिवार में 5 लोग थे कुशाल के माँ -पिताजी और 2 छोटे भाई बहिन , चूंकि गांव के पास कोई कॉलेज नही था तो कुशाल को 12 वी के बाद पढ़ने को शहर अपने चाचा के पास भेजा गया जो ड्राइवर का काम करते थे .कुशाल एक अन्तर्मुखी, गोल चेहरे व मध्यम कद काठी का नौजवान था ,स्वभाव से सरल , भावुक , उसमे आत्मविश्वास नाममात्र का था और हिचकिचाहट अधिक, इसलिए दोस्त भी कम ही बने , बचपन पहाड़ में बिता इसलिए पहाड़ उसके रग रग में बसा था , वह इस शहर में रहकर भी शहर में अपने गाँव को ढूंढा करता था , जहां sunday या किसी अन्य छुट्टियों में लड़के फ़िल्म देखने, क्रिकेट मैच खेलने या घूमने जाते ,ये शहर से थोड़ी दूर बने एक पार्क में जाता ,जहां वो प्रकृति को अपने पास पाता था जो उसे उसके गांव की याद दिलाता था , कभी कभी वो बस स्टैंड जाता अपने गांव की ओर जाने वाली बस को निहारता और भावुक हो जाता , और फिर दिन गिनता की कब exam खत्म हो और वो गाँव जाए , कहते हैं हर लड़की को अपना घर छोड़कर दूसरे घर यानी ससुराल जाना पड़ता है और उनका विरह, दुःख वो ही समझ सकती है पर शायद पहाड़ में ये विरह- दुख लड़के भी कई वर्षों से महसूस करते आ रहे हैं जो पढ़ाई, नॉकरी के लिए पराये शहर जाते रहे है.कुशाल के लिए भी ये ससुराल वाला विरह ही था ..वो कलेण्डर में हर बीती तारीख को पेन से काटता और बचे हुए दिनों को गिनता , उसे यूँ तो गाँव की हर स्मृतियां उसे भावुक करती थी मगर उसके घर के ऊपर की पहाड़ी में स्थित आड़ू का पेड़ उसे बहुत याद आता था ..याद आने की वजह यह थी कि ये पेड़ कुशाल के द्वारा ही लगाया गया था और लगाने की वजह ये थी कि कुशाल के चाचा और पिताजी के बीच जब घर और खेत का बंटवारा हुआ तो एक खेत की सीमा तय करने खेत के किनारे में एक पेड़ लगाने का निश्चय किया गया जिस को आधार मान कर एक सीधी रेखा खींच के खेत की सीमा तय की जा सके ..अब पेड़ कुशाल ने लगाया था तो उससे भावनात्मक जुड़ाव स्वाभाविक था उसका बचपन और ये पेड़ साथ साथ बड़े हुए थे, गाँव के इसके साथ के लड़के पेड़ को इसका बच्चा कह कर मजाक भी उड़ाते थे ,अब मजाक उड़ना भी लाज़मी था क्योंकि कुशाल की हरकतें ही कुछ ऐसे थी, उस पेड़ की वो ऐसे देखभाल करता था जैसे सच मे मां अपने बेटे की करती है उसपर किसी को चढ़ने न देना, बंदरों को आस पास फटकने भी न देना ,न जाने कितनी जंग उसकी बंदरों के साथ हो चूंकि थी , वह दिन में एक बार पेड़ के पास जरूर आता था , उसे उस पेड़ में सब से अच्छा तब लगता था जब उसमे हल्के सफेद हल्के गुलाबी फूल लगते थे, पुरा पेड़ एक गुलदस्ता सा लगता था और आड़ू के पेड़ में जब फूल लगते हैं तो उस समय पेड़ में पत्ते नहीं होते डालियॉँ में बिना पत्तों को बस फूल ही होते हैं मानो आड़ू के फूल स्वयं को इतना सक्षम समझते हैं कि उन्हें पत्तों की ओट स्वीकार ना हो .. कुशाल को इसके फूल खिलने का सालभर ईंतजार रहता था, और जब फूल खिलते वो इस पेड़ के नीचे घंटों बैठा करता ,गर्मी में उसकी ठंडी छांव, और हल्की हल्की हवा उसे एक अविस्मरणीय सुखद एहसास देती थी , और जैसे जैसे इसके फूल फल में बदलते इसका चेहरा भी निराश होता जाता उसे फल से ज़्यादा पेड़ में बस इसके फूल पसन्द थे , वो फल से ज़्यादा इसके फूल को इस पेड़ का श्रृंगार समझता था , उसे फल का कोई मोह नही था , उसे बस वो प्रकृति की विस्मय करने वाली सुंदरता का मोह था .वो शहर के जिस पार्क में घूमने जाता था उसके पीछे उसके गाँव के आड़ू के पेड़ का आकर्षण ही था ।, पार्क में खिले फूलों को देख कर वो उनमे अपने आड़ू के पेड़ के फूलों को ही ढूँढता था ,और कुछ समय के लिए वह पार्क उसे उसके गांव में होने का एहसास देता था.
मार्च के साथ मई भी खत्म होने को है गर्मी अपने चरम में है और गर्मी के साथ कुशाल के गाँव जाने की व्याकुलता भी ..exam खत्म हो चुके हैं और कल उसे इस गर्मी से भरे शहर से निकल कर सुहावने , ठंडी हवा लिए अपने गांव जाना था , सारा जरूरी सामान बांध दिया है. छोटे भाई बहन के लिए कुछ छोटी चीज़ें रख ली हैं..अब बस इंतजार है इस लंबी रात के खत्म होने का..वैसे गर्मियों की रातें छोटी होती है पर उसकी व्याकुलता ने उसे कई सदियों की बना दी थी..चलो जैसे तैसे करवटे बदलते बदलते रात कट गई..कुशाल तड़के ही बस स्टैंड गया ,अपनी गांव जाने वाले बस में बैठा और चल पड़ा जैसे पहली बार ससुराल से वधू मायके वापिस आती है कुशाल के भाव भी कुछ यूं ही थे ..जैसे जैसे शहर छूटता गया वैसे वैसे गाँव के चित्र उसके दिमाग मे आने लगे , आखिर वो गांव के अपने बाजार आ गया वहाँ से दूर पहाड़ी में उसे अपने गांव की पहली झलक मिली, उसने एकटक गांव देखा और भावुक होकर ,कुछ पल निहारकर पैदल ही गाँव के लिए निकल पड़ा, उसने देखा गांव के पगडंडियों की जगह एक सड़क ने ले ली थी ,सड़क बन तो गयी थी पर अभी ऊबड़खाबड़ थी और उसमें अभी कोलतार बिछना बाकी था इसलिए गाड़ियों का आवागमन नही था शायद 2, 3 महीनों में उसमे गाड़ी भी चलने लगे और कुशाल अगली बार आये तो गाड़ी से सीधा अपने गांव चला जाये।।खैर कुशाल पैदल ही उस सड़क के साथ साथ गांव की और चलने लगा हर खेत, हर पेड़, हर पत्थर को निहारते हुए , खुश होते हुए की वापिस ये सब देख रहा हूँ कुछ भी नही बदला, हाँ सड़क से रास्ते मे कुछ परिवर्तन आया है पर आस पास वैसा ही है,, गांव के कुछ लोग रास्ते मे मिले कुशाल को देख के रुके , कुशाल ने नमस्ते करते हुए हाल जाना ,उन्होंने भी कमजोर हो गया है, लंबा हो गया है इत्यादि टिप्पणी कर के प्रारंभिक मुलाकात कर अपने रास्ते लग गए , गाँव धीरे धीरे नज़दीक आ रहा था और इसकी उत्सुकता बड़ती जा रही थी , गांव से पहले ये नई सड़क उसे उसी खेत मे ले गयी जहां इसका प्यार से पेड़ स्थित था , कुशाल भी एक माँ के जैसे अपने बेटे को देखने को आतुर था वो लंबे लंबे कदम भर के सड़क के साथ खेत की और चल रहा था , इंतजार खत्म हुआ और वो खेत मे जा पहुंचा बड़े उत्सुकता से उसने पेड़ की तरफ देखा . पर ये क्या ! पेड़ तो नदारद था , कुशाल को एक सेकंड भी ना लगा ये समझने को की इस सड़क ने उसके प्यारे पेड़ की बलि ले ली है. उत्सुकता और खुशियां गायब हो चुकी थी, उसने आजतक अपने परिवार के किसी भी सदस्य की मृत्यु नही देखी थी .पर आज उसने उस भाव को महसूस किया जब परिवार का कोई गुजरता है तो वो दर्द वो पीड़ा बस परिवार के सदस्य ही जानते है , उसी प्रकार की पीड़ा, भाव से अभी कुशाल पीड़ित था , वो रोना चाहता था पर रो नही पाया शायद उसने सोचा पेड़ के प्रति ये भाव देख कर लोग और उसका मजाक उड़ाएंगे .वो मौन रहा ,पेड़ के अवशेषों को नजरों से निहारते हुए , थोड़ी देर उस स्थान पर बैठा रहा जहां पेड़ था . और फिर निराश भाव लेकर चल दिया , वो अब इतना बड़ा हो चुका था कि अपने स्वाभाविक भाव को चेहरे के बनावटी भावों में बदल सके .अंदर दर्द और चेहरे पर मुस्कान लिए वो अपनी घर की और चल दिया..घर पहुंचने पर क्या हुआ ये हमारा विषय नही है , छुट्टियों के इस प्रवास में जीवन ने उसे एक नया मोड़ दिया था ,और कुशाल की इस उम्र में यदि कोई बात, सबक दिल पे लग जाये तो वो ता -उम्र के लिए व्यक्ति की सोच की दिशा बदल देता है . कुशाल के साथ भी ऐसा ही हुआ उसने अपने पेड़ के प्रति लगाव ने , उसकी प्रकृति के प्रति सोच में बदलाव कर दिया सड़क ने उसके ही नही न जाने कितनों के पेड़ों की बलि ली होगी , विकास हम रोक नही सकते पर विकास के side effect से होने वाले परिणामो को हम कम कर सकते हैं..
बस एक सुबह जब गांव के लोग एकत्रित थे ग्राम प्रधान, स्थानीय नेताओं , इत्यादि लोगों को गांव तक सड़क लाने के लिए सम्मानित करने के लिए , कुशाल चुपचापअपने खेतों में गया और चार अलग अलग फलों के पेड़ लगाए , और बाकी छुट्टियां उन्हें सींचता रहा..
आज फिर मई का महीना है कुशाल second year की परीक्षा दे कर छुट्टियों में गांव जा रहा है..अब गांव की सड़क में मोटर कार चल रही थी वो फिर भी पैदल अपने गांव की और चला , गांव आया तो पाया उसके लगे पेड़ लहलहा रहे थे , आज उसके मन के भाव वैसे ही थे जैसे नवजात के जन्म लेने पर माँ के होते हैं आज भी वो मौन ही था ,आज भी पेड़ में बंदर थे पर आज उसने उन्हें भगाया नही क्योंकि वो जान गया था पेड़ों के श्रृंगार में इनका भी योगदान है ..और इन छुट्टियों में भी चार पेड़ और लगाने की सोचते हुए घर की और चल दिया ..
【आशीष नौटियाल】

मार्मिक, बहुत खूब 👌👌
ReplyDeleteआभार आपकी मूल्यवान टिप्पणी हेतु
ReplyDelete